ishq di mithi aag ( shayri )

तेरे इश्क दी मीठी आग में भस्म हो गए ,
अब बस उड़ते रहते है तेरे यादो के मौसम में राख बनकर | H.P.RAHI

aznabi shaam..

कॉफ़ी के तो बहुत ठिकाने हैं, बस शाम ने ही बात करना छोड़ दिया हमसे..
ज़िन्दगी बस दौड़ते जा रही है, यूँ तो ढून्ढ रहे हैं हम खुदको कबसे|

-DT

hasarato ke chirag ( shayri )

बस एक उल्फत ने धुआ कर दिए मेरे हसरतो के चिराग ,
कभी तूफ़ान से कश्ती बचाना इतना आसान तो न था | H.P.RAHI

savan ( shayri )

याद आती है वोह आग बहोत , जिसे बुझे हुए ज़माने हो गए ,
के कभी सावन बीत जाया करता था हर बरस , और अंगारे फिर भड़क उठते थे | H.P.RAHI

deewana ( shayri )

वो कहते है , ग़ज़ल से दोस्ती अच्छी नहीं “राही” ,
पर मैं अगर शायर न होता तो दीवाना होता | H.P.RAHI

jafa ( Shayri )

जफा की राह में हम तो वफाओ से गए ,
दिलजलो से मिल गए और दिल जला के आ गए | H.P.RAHI

thaka thaka ek rahi hoo main ( Ghazal )

एक सपना देखा , कितना वोह अच्छा सपना था |
कुछ अपना भी देखा था , कितना वोह सच्चा अपना था |

ख़त कितना सुहाना था , कागज कुछ पुराना था ,
कुछ धुंधला सा कुछ उभरा सा , वोह तेरा इकरारनामा था |
बहता बहता एक आसू आया , पोछ गया कुछ स्याह को ,
कितना बेरहम यह आसू था , ले गया तेरे दिल को ,
एक यह दिल ही तो मेरा अपना था , भले कागज़ पे ही था जो ,
और तो सब कुछ धुआ धुआ सा सांस दे गया तेरे तन को |

बरबस कही एक पत्ता पाया ,
पत्ते पे कुछ अपना पाया |
मिलो उडी हवा की छाया ,
छाया में भी खुद को पाया |
राख राख एक अंगारा था ,
उडी हवा तो वोह भी छाया था |
एक बादल मस्त बदन का पाया ,
वोह भी बरसो से ना बरसा था |

इन अपनों का मिश्रण हूँ मैं ,
इन सपनो का जीवन हूँ मैं ,
वीरान मंजिल के ढांचे पर बैठा ,
थका थका एक राही हूँ मैं |

H.P.RAHI

shauk ( Shayri )

तेरे दरे आस्ता , सबब बेकसी मेरी ,
गर मैं तेरी जरूरत नहीं , तो तेरा शौक ही सही | H.P.RAHI

phir nayi phursate ( Ghazal )

एक ख्वाब की बख्शीश को संभाले , फिर नयी फुरसते …

घूमते रहें एक रात ओढ़े हुए चुपके से ,
यादो की गलियों से कुछ कदमो के निशान चुराए |
फिर नयी फुरसते…

चाँद बांधे मुट्ठी में तारो से जगडा किये ,
कुछ टुकड़े चांदनी के धुप में सुखाये |
फिर नयी फुरसते…

फिर उन्ही पानियों में हम नमक थामे रहे ,
लम्हों के वादे, सदियों में निभाए |
फिर नयी फुरसते…

H.P.RAHI

Mera No. kab aayega (a film by Raghuram, my colleague and my good friend)

Raghuram is from bengaluru. He made this film during his engineering time at NIT Surat. Watch this one. You will love this film definitely.

shaam ( Ghazal )

शाम , पलकों में डूबी एक किताब सी लगती है ,
पत्तो पे जिसके ढलकी , शायद कुछ शराब सी लगती है |

शाम , घायल अश्को से भी घायल लगती है ,
गहराई से देखा तो यह एक हिसाब सी लगती है |

शाम , पागल दिल सी पागल , किसी बोजिल शबाब सी लगती है ,
बुझते हुए चिराग से भड़की जलती छाव सी लगती है |

H.P.RAHI

uuns ( Shayri )

उन्स उठते है तो जिगर के छाले मेरे रो पड़ते है ,
के आग बुझाकर मैं उनपे राख मल देता हूँ ,
मेरी जिंदगी का रंग बहोत धूसर सा लगता है मुझे | H.P.RAHI

baras..

बरस बरस के बरस गया..
तुझसे मिलने को दिल तरस गया..
जानता हूँ आस पास ही है तू कहीं..
युहीं बीत जाता है एक बरस नहीं..
नजदीकिया नहीं अब मुझे तू साथ दे..
जिसके लिए हूँ तरसा अब वो मुलाक़ात दे|

DT

HPRAHI on IMDB.COM

Hey Guys,

One great news from me. I have been registered as a lyricist on world’s biggest and most authenticated International Movie Database “IMDB”. Its for a film “An affair with newyork”. This film also won “Best Film Critic” in JIFF (Jaipur International Film Festival).

http://www.imdb.com/name/nm3797908/

The song for which I am on IMDB is from film “An affair with newyork”

अनजानी राहों पे है अनजानी मंजिले ,
तू पाने चला क्या भला ,
कोरी हथेलियों पे कहानी लिखी है जो ,
कौन सुनाएगा भला ,
है नया सा कारवा , और मुसाफिर नया तू यहाँ ,
तो करले , करले सपने जवा ,
एक कोशिश नयी , नयी दास्ता |

एक ख्वाब की कोशिश नए सिरे पाने की ,
कुछ अनसुनी सी धुन मेरी सुना जाने की ,
धुआ धुआ सी रौशनी मेरी दहकने लगी ,
तो करले , करले सपने जवा ,
एक कोशिश नयी , नयी दास्ता |

इस भीड़ में मिला मुझे हँसी हमसफ़र ,
आसा हुयी मुश्किलें , जीने लगा यह सफ़र ,
दबी दबी सी आरज़ू , मेरी धडकने लगी ,
तो करले , करले अरमा जवा ,
एक कोशिश नयी , नयी दास्ता | H.P.RAHI

uljhan

कुछ अरसा बीत गया है..कुछ लम्हे रह गए हैं..
जाने इस ख़ामोशी में हम क्या कह गए हैं..
सुनते आये हैं लोगो से अक्सर ये हम..
वक़्त की करवट में बहुत दम है..
वक़्त ने बदल डाला इतना कुछ…
हम नहीं जाने, हम बदले या वही रह गए हैं|

DT

hizr ( Shayri )

वोह जुबा पर क्यों ऐसे आता है ,
दिल जलाता है चला जाता है ,
उस दिलरुबा को जाने क्या कहिये ,
जो ख्वाब को भी हिज्र बना जाता है | H.P.RAHI

हिज्र – जुदाई |

manhusiyat ( Shayri )

वोह रहगुज़र मेरी रहगुज़र रहे ,
साथ चलने से कुछ इत्तेफाक हो जाते है |
अपनी मनहूसियत की चर्चा करता फिरता हूँ ,
साथ चलने वाले कुछ करम कर जाते है |H.P.RAHI

Renaissance Theme Song, Its a dream come true for me.

This is a theme song for Jecrc’s annual fest Renaissance. Its a dream come true for me. I m attaching the Mp3 version of this performance. We have recorded it when we were practising it. If you want to see the stage performance of this song than go to this link

I have wrote this song while I was attanding my first Renaissance. But It couldnt be converted into a complete song. Than after that failure. I wrote this song again in second year. Somehow this time was also the same story. Its very tough to get some composers and players who can actually create originals. and in the third year it happened again I wrote it again completely fresh. But It was also a failure. But wait I still have my last year. This time I found someone who really love the music to the core of his heart. Anshul Medatwal. My classmate who plays guitar extremly well. He also never performed on stage during this four years. So two hidden artists met and decided to burn the curtains. There was one more man who was in our team. Mr. Anoop Singh. He is a gem singer and also unsung during college time. Now first we composed the song completely and decided to sing it in chorous. We had one more singer with us. Abhishek Swami. This man has very potential. He has one more talent. He is a great dancer as well. He is in the team of Enigma Dance Group. But we need some more musicians. at least a drummer could make us complete. So we found a genius drummer. AAditya Patvardhan. He was the most talented guy in our team. We prepared the complete song and there it was the moment when our band was on the stage. My dream was about to be succeed. and jecrc find it cool. they liked it. some of them gave us Standing Owetion. When there was that loud sound of clapping I lived my dream in that moment. So that was my theme song story. :)

हमारी जान है ये , सबकी पहचान है ये ,
हमारा जूनून है ये , दिलो का सुकून है ये ,
हमारी तरह तुम अहसास करो ,
come on feel renaissance

हस्ते हुए मुंडेरों से गाती हुयी बहरे चली ,
येह आग है जली जली , मस्तानी हवाए हुयी ,
कोई नई झनक बजी , सुरों की नयी धनक है सजी ,
कोई नई झनक बजी , सुरों की नयी धनक है सजी |
come on feel renaissance

एक बूँद ख्वाब की टपकी जो आँख से ,
अहसास हो गया हमें , है जोश अब जान में ,
इस जोश को तू दे सिरे , बन जाये नए सिलसिले ,
बढा कदम तू एक बार , पायेगा नया आसमाँ |
come on feel renaissance

तेरे लिए ही काफिले गुजरे है इसी रास्ते ,
हो चल तू संग संग लिए कुछ सपने अपने वास्ते ,
बदल जा तू अभी जरा , महक जा तू अभी जरा ,
है जो आग तुझमे तो दहक जा तू अभी जरा |
come on feel renaissance          H.P.RAHI

thts time..

सोचता हूँ ना सोचेंगे अब तुम्हें
हर चीज तेरी याद दिलाती है
जिस हंसी के लिए ज़िन्दगी थी हमारी
आज वही हंसी हमें रुलाती है|

DT

kaise..

पल पल याद का एहसास उन्हें दिलाएं कैसे
अपने ख्यालों की तस्वीर उन्हें दिखाएं कैसे
उनसे मिलने के बाद जुदाई को समझा है हमने
अपनी बेचैनी  को शब्द हम पहनाएं कैसे|

DT

Hum hi hum na rahe ( Shayri )

हाय उल्फत ए मुसीबत, जब भी पड़ी , भारी पड़ी ,
तुम तो आखिर तुम ही थे , हम ही हम न रहे | H.P.RAHI

bahak jana baki hai ( Ghazal )

चले जाना के अभी इस रात का एक पहर बाकि है ,
चले जाना के अभी इस दिल का एक अरमान बाकि है |

धड़कते दिल तड़पते है , मचलते दिल तरसते है ,
चले जाना के अभी इन सब का जल जाना बाकि है |

जिस दिल को संभाले थे , हमने उसको खोया है ,
चले जाना के अभी इस नुकसान का हर्जाना बाकि है |

तेरी आँखों के पैमाने पिए हमने नहीं पुरे ,
चले जाना के अभी किसी का बहक जाना बाकि है |

H.P.RAHI

Salaam Jaipur ( Shayri )

इस शहर की हवाओ ने मुझसे गले लग कर कहा ,
देख जितने ख्वाब तू, मिल के हम पुरे करेंगे |
जिंदगी एक जश्न है और जश्न यह खुलकर करेंगे |H.P.RAHI

HPRAHI playing “kal ho na ho” on violin

harf ( Ghazal )

सहर तक आते आते हर पल को गिनता रहा ,
मेरे दिल अजीज एक ख्वाब ने सताया बहोत मुझे |

कभी कभी अपने भी जरा कुछ काम आ जाते है ,
मेरी ग़ज़ल से टूटकर एक हर्फ़ ने सिखाया बहोत मुझे |

एक हवा रोज आखो में आ जाती है कुछ तिनके लेकर ,
मेरे वतन ने हर तरह से पुकारा बहोत मुझे |

दौड़ता रहा पीछे पीछे बहोत दूर तक रेत पर ,
कुछ कदमो के निशानों ने थकाया बहोत मुझे |

सहर – सुबह , हर्फ़ – अक्षर |

H.P.RAHI

Phursat ( Shayri )

बहोत ढूंढता रहता हूँ कुछ पल फुरसत के लेकिन ,
वक़्त उदास सा किसी कौने में छुपा रहता है |
मुझसे नाराज़ है शायद |H.P.RAHI

mausam..

बदली मचल गयी है..
या कोशिश तेरी मेरे ओर आने की
याद दिला रहा है मौसम…
हमे उस बीते ज़माने की
इक पल बीता नहीं तेरे बिन..
आज खबर नहीं अरसा बीत जाने की
क्यूँ मानता नहीं सच्चाई को..
आस है आज भी तेरे घर आने की

DT

jangju ( Shayri )

कहा टिकता है कोई जर्रार मेरे सामने , आज दिल जंगजू बहोत है |
रहेगा आसमान भी मेरे कदमो तले , आज परवाज बुलंद बहोत है | H.P.RAHI

जर्रार – बहोत बड़ी सेना , परवाज़ – उडान |

teri baahein ( Ghazal )

तेरी बाहे सुनी राहें छोड़ कर जा चुकी होंगी ,
कही तो आग लगी होगी , कही बरसात हुई होगी |

रहा करते थे जिनकी धडकनों में हम ,
तडपता छोड़ कर जाना उनकी आदते होंगी |

उन्हें हम ग़म के मारो का मसीहा कहते फिरते थे ,
के मसीहा बन के तरसाना उनकी ख्वाहिशे होंगी |

लरबते होठो के प्याले छुआ करते थे होठो से ,
मगर दिल ही न छु पाए , यह अपनी किस्मते होंगी |

कि सागर के छलकने से यह साहिल टूट जाते है ,
कि कश्ती का बिखर जाना उनकी रहमते होंगी |

H.P.RAHI

sazda ( Shayri )

सजदा मुनासिब हो अगर वादाखिलाफी हो जाये ,
बेकसी पर नज़र से भरी कुछ खता तो हो जाये |H.P.RAHI

बेकसी – बेबसी |

hausla ( ghazal )

मेरा कम नहीं है हौसला , न यु अदा से मिला करो ,
मेरे घर में भी है आइना , न नज़र से इतनी दुआ करो |

मुझे ग़म नहीं किसी और का , जैसी भी यह ज़ीस्त सही ,
मुझे कह दो बेवफा मगर , न इस तरह से वफ़ा करो |

सौ बार के ग़म से बेहतर एक जान ही दे दे न क्यों ,
एक कोशिश तो पूरी होने दो , न मुझे यु साँसे दिया करो |

जीस्त – जिंदगी |

H.P.RAHI

mausam

कुछ इस तरह बरसा है मौसम..बस रात है इन आखों में
कुछ इस तरह तनहा है मौसम..बात सिर्फ तेरी मेरी बातों में
तू सुन रही है अगर मुझे..कोई इक इशारा तो दे
जीने का बहाना मिले..शायद तेरे इशारों में
सुना है..आते हैं मौसम चार बीतते इन सालों में
हमारा तो अब एक है मौसम ज़िन्दगी की राहों में

DT

do chand hi bo diye to kya ( Ghazal )

एक ‘राही’ भुला भटका सा , दो चार कदम पर मंजिल क्या ,
यह बहोत आम सी जिंदगी , एक उम्र जिए तो जिए ही क्या |

हर शाम थकी इन राहो को मैं घर की राह दिखाता हूँ ,
कुछ करने की यह जिद ही सही , दो ख्वाब ही देख लिए तो क्या |

खुद अपनी जमीं पे अपना आसमान उगायेंगे ,
चाहे सितारे साथ नहीं , दो चाँद ही बो दिए तो क्या |

अपने लिए सब एक बराबर जश्न का मौका होता है ,
वो रात का सन्नाटा कैसा , और दिन का पागलपन ही क्या |

H.P.RAHI

toofan..

एक दिन कुछ ऐसा आया मेरी ज़िन्दगी  में..
कोई यादें रह गया..
कोई पिंजर रह गया!!

DT

chahat (Shayri)

हर आहट में बस आहट तेरी है…
हर चेहरे में बस सूरत तेरी है..
लोग कहते हैं की तू नहीं है..
हमारी तो हर इबादत में बस चाहत तेरी है!!!

DT

koshish.. (Shayri)

न जाने कितने दिनों बाद लिखने का मन किया है..
न जाने इस बीच मैंने क्या जीया है..
शायद बीत गया एक अरसा एक लम्हा जैसे..
लाऊंगा वो लम्हे अब में वापिस कैसे..
कुछ दर्द मिला होगा उनमें जो वापिस यहाँ हूँ..
देखो मैं आज फिर कुछ लिखने लगा हूँ..
कुछ टूटा सा, कुछ फूटा सा..
एक साथी कहीं कोई छूटा सा..
कोशिश कर रहा हूँ में वो कहानी बताने की..
कोशिश मेरी फिर से है इक शेर बनाने की!

DT

meri tanhai (Shayri)

एक गुजरती हुई शाम बन गयी हो तुम..
जो मदहोश कर दे वो जाम बन गयी हो तुम..
इस कदर तेरी यादों में खोये रहते हैं की..
मेरी तन्हाई का नाम बन गयी हो तुम!

DT

u, me aur hum (Shayri)

गुजर रहे थे हम राहों से..तेरी खुशबु सी आई,
हिम्मत नहीं हुई की तुझे ढूंढ़ सकें..बस जरा आखें भर आई,
इस कदर बसे हो सासों में तुम..शायद ज़िन्दगी भी हमे जुदा न कर पायी

DT

har waqt dhua sa rahta hai ( Ghazal )

हर तरफ हर वक़्त धुआं सा रहता है |
एक धुप का टुकडा डरा सा रहता है |

जब भी गुज़रा मैं जली इन बस्तियों से ,
तजरूबा मेरा बुरा सा रहता है |

आपके शहर से दोस्ती हो कैसे ,
हर शख्स कितने शख्स बना सा रहता है |

जिन्दगी एक तपिश सी क्यों है ,
जो भी जीता है , जला सा रहता है |

H.P.RAHI

Ab woh ek Ahsaas hi hai bas ( Nazm )

सुन मेरे खुदा , आज मुझ पर एक करम कर ही दे,
मुझे वक़्त से कुछ पल के लिए आजाद कर दे,
कही किसी मोड़ पर कोई छुट गया है,
उसे जरा फिर एक झलक देख आऊ,
हो सके तो थोडी सी सांस ले आऊ ,
जिदगी का भरोसा मेने खूब देखा है ,
आज नहीं गया तो न जाने फिर कब वक़्त मिलेगा मुझे ,
आदत नहीं है , तनहा सफ़र होता नहीं है मुझसे ,
वोह कोई रहगुज़र जो मेरे साथ हमेशा थी ,
बस उस पर से कुछ कदमो के निशान ही ले आऊ ,
मैं जाकर वोह खुशबू ही कैद कर ले आऊ,
जो महका देती थी मेरे हर जर्रे को ,
जो अनुभव बस बन कर रह गया है एक अहसास ही |

H.P.RAHI

jaroori to nahi ( Shayri )

देखना चाहे कोई उनको तो हर जगह देखे ,
पर हर नजारे की नज़र हो यह जरूरी तो नहीं |
उनकी आँखों के निशाने से ही मर जाए लेकिन ,
उस निशाने पर यह दिल हो यह जरूरी तो नहीं |H.P.RAHI

nain, dil, lab ya kaish kahi koi to naraj hai ( Ghazal )

दबे दबे से गीत के पीछे जाने क्या राज है ,
क्या तुम्हारा प्यार मेरे लिए अब बिना परवाज है |

आज दर पर आहट हुयी , पर कुछ रौशनी न हुयी ,
दिल तक न पहूची यह तुम्हारी कौनसी आवाज है |

जानते है यह संसार है नापाक तो होगा ही ,
पर हमारे बीच में यह कौन जालसाज़ है |

तुम्हारे इनकार कि कुछ तो वजह होगी ,
नैन , दिल , लब या कैश , कही कोई तो नाराज़ है |

H.P.RAHI

ummeede mitati chali gayi ( Shayri )

wrote after getting harassed with kota exeperience.

उम्मीदे मिटती चली गयी , रास्ते जलते चले गए ,
जिंदगी का सफ़र चल न पाए हम , हर दिन हर रात मरते चले गए |
उफनती नदिया सागर सी लगने लगी , सुखी हुयी नहरे सहरा सी लगने लगी ,
बिगडे आसान काम भी , हम खुद को ठगते चले गए |H.P.RAHI

सहरा – रेगिस्तान |

woh nadi kuch yu bahi ( Shayri )

रात की खामोशियों को सुनना हमको आ गया ,
वोह नदी कुछ यु बही कि सागर ही मिलने आ गया | H.P.RAHI

kaarwa ghamo ka ( Ghazal )

कारवा गमो का गुजरा था मेरे दर से ,
हमारे हाथो से सागर टूटने से लगे है |

तुम्हारी दुआए हम तक पहुची ही थी ,
जिंदगी और मौत के सिरे छुने से लगे है |

भीगने लगी है जिंदगी की राहें ,
दिलो के जख्म सुबकने से लगे है |

अपने अंजुमन में क्या कमी थी आंसुओ की ,
वक़्त के कुछ और सितम जुड़ने से लगे है |

सागर – शराब का प्याला , अंजुमन – सभा |

H.P.RAHI

mera jakhm kuch aur khul gaya ( Ghazal )

मेरी तन्हाइयो का साथी मुझको मिल गया ,
तिशनगी थी इतनी कि सारा मयकदा मैं पि गया |

मेरी पहचान का कोई काफिला गुजरा था मेरे दर से ,
शहनायिओ कि आवाज थी कि मैं सारी रात जी गया |

था नहीं यकीन कि इस तरह से गुजरोगी तुम मेरे सामने से ,
उस यकीन कि मौत थी कि जशने ग़म का आलम वोह दे गया |

वोह शब् कटी के मैं कटा कुछ भी नहीं खबर ,
था चुप्पियों का शोर के मेरा जख्म कुछ और खुल गया |

तिशनगी – प्यास , शब् – रात |

H.P.RAHI

diljala ( Ghazal )

वोह यार मेरा दिलदार मेरा कुछ अनसुना सा हो गया ,
जल गए हम भी कसक में , वोह दिलजला सा हो गया |

जब समंदर से मैं गुजरा साया अपना खो गया ,
जिसकी तलाश में था मैं भटका , ये सहरा पासवा सा हो गया |

उस किरण का था ये वादा , साथ में हमसाया होगा ,
बुझना ही बाकी था जिसका , जलजला सा हो गया |

उन दिलजलो की याद में नुकसान अपना हो गया ,
जो था कभी दुश्मन सा वोह , अब मेहरबा सा हो गया |

सहरा – रेगिस्तान |

H.P.RAHI

tum bin ( Ghazal )

कैसे रहोगे तन्हा हम बिन ,
जी न सकेंगे हम भी तुम बिन |

दिल पर बोझ यादो का इतना ,
मर भी सकेंगे कैसे तुम बिन |

शाम तो कट ही गई पीते पीते ,
जाने कैसे कटेगी यह रात तुम बिन |

‘राही’ भूल रहा है अपनी मंझिल ,
बदले बदले से जो है यह नज़ारे तुम बिन |

H.P.RAHI

jine ke bahane bahot hai ( Shayri )

दिल रोता है , होंठ मुस्कुराते है ,
मुस्कुराने के बहाने बहोत है |
मायूस हो जाता हु रोज मगर ,
जीने के बहाने बहोत है |H.P.RAHI

woh kya raat thi ( Ghazal )

वो रात भी क्या रात थी ,
तुम थे और था चाँद थोड़ा थोड़ा |

कर रहे थे प्यार मुझको ,
और था इताब थोड़ा थोड़ा |

थोडी थोडी मुहब्बत थी और ,
था तेरा नखरा थोड़ा थोड़ा |

सारी छत पे थी खुशबू महकी ,
जो था तेरा इकरार थोड़ा थोड़ा |

इताब – गुस्सा |

H.P.RAHI

chalka chalka paimana ( Shayri )

यह झूठो की बस्ती है , यह मुर्दों का तहखाना है ,
इनसे क्या लेना देना मुझे , अपना हमदम तो विराना है |
अब साजे सागर क्या कहिये , छलका छलका पैमाना है ,
जो बीत गए वोह दिन थे मेरे , है शाम जिसे अब जाना है | H.P.RAHI

intezaar ( Shayri )

हम रात जागते रह गए , हम राह तकते रह गए ,
शायद वोह मोड़ मुड गए होंगे , या हम ही किसी की मंजिल न थे | H.P.RAHI

tere karam ( Shayri )

हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं | H.P.RAHI

aap hum me woh yarana woh muravvat kaha ( Ghazal )

रेत के महल बनते है सिर्फ़ टूटने के लिए ,
इनके इरादों में वोह माहो-साल कहा |
दे दो जवाब सवाल मुस्तकविल मेरे ,
आपके जिगर में वो हाल कहा |

हाले दिल भी कभी सुना होता ,
तड़प होती है क्या यह जाना होता |
करते थे तसल्ली किसी ज़माने में ,
दीद को भी अब वोह दीदार कहा |

भड़क उठते ये शोले कभी न बुझने को ,
जो कभी बेडियों में शबनम को बंधा होता |
अपनी चाहतो को करते खुल कर बयां पर ,
आप हममे वोह याराना वोह मुरव्वत कहा |

दीद – दर्शन ,मुरव्वत – लिहाज |

H.P.RAHI

yu rato me na milne aao ( ghazal )

मेरे मुफलिस तेरे ही दामन में सोया हूँ ,
ख़बर भी नही इतनी गुम हो , क्या मेरे ख्यालो में खोयी हो |

शब् भी बहोत लम्बी सी है ,
इसे तेरे आने की ख़बर है जो |

तन मन में इतना शोर मचा है ,
आज सिने में जैसे दो दिल हो |

तुमको रोकू पहरों पहरों ,
गर महताब पे बस चल जाए तो |

इस जालिम दिल को रोक सकू ,
यु रातों में न मिलने आओ तो |

मुफलिस – निर्धन , शब् – रात ,
महताब – चाँद |

H.P.RAHI

andaza ( shayri )

बहोत देर तक अंदाजा लगाते रहे ,
वोह आयेंगे किस ओर से दिल में ,
ज़िन्दगी ऐसे ही ख्याल बुनती रही ,
वोह आए और आकर चले गए ,
हम बस बहोत देर तक अंदाजा ही लगाते रहे |       H.P.RAHI

Numaeesh ( Ghazal )

रेगजारो के दिल की गुलिस्ता क्या जाने ,
बहोत से ख्वाब नुमाइश पर लगा आया हूँ |

दिल ता जिगर तेरी रहगुज़र का मुंतजीर सा हुआ ,
गाफिल वहा हर साँस भूल आया हूँ |

हर रंग मेरा कैस का हर रंग लगे ,
अपनी सूरत के कई नकाब गिरा आया हूँ |

मेरा परवर भी गमगुसार हुआ ,
तेरे फरेब पर एक गर्द बिछा आया हूँ |

रेगज़ार – रेगिस्तान , मुंतजीर – इंतज़ार करने वाला ,
गाफिल – बेहोश , कैस – मजनू , गर्द – धुल |

H.P.RAHI

Woh Khat ( Ghazal )

सुबह को तेरा ख़त जो मिला था ,
सहरा में इक फूल खिला था |

तेरी आँखें याद आई थी ,
मयखाने को भूल गया था |

अँधेरा ही हकीकत थी मेरी ,
कोई दीप ले आया वोह तेरा ख़त था |

शाम को मैं फिर मयखाने में हूँ ,
जो मिला था, तेरा कोई पुराना ख़त था |

सहरा – रेगिस्तान

H.P.RAHI

tareef ( Ghazal )

तेरी आँखों ने यह जो कह दिया ,
बस इसको ही मैंने शायरी नाम रख दिया |

तालियाँ बजी थी , तारीफे थी मेरी ,
तेरा नाम जो मैंने महफिल में कह दिया |

जिस रात दिखा था तेरा चेहरा ,
उस रात को मैंने चौदहवी कह दिया |

तुम भी बन जाओगे मशहूर शायर ,
मेरी तरह जो तुमने उनको सुन लिया |

H.P.RAHI

Deewanagi (Song)

उनकी एक अदा पर हम क्या कर गए ,
दीवानगी की हद से हाय गुज़र गए |

उनसे नज़रे मिले कब , दिल ये बातें सोचे अभी ,
इस आशिकी के रास्तो से, कैसे गुज़रे यह सोचे अभी ,
आँख भी ना लगे अब , कैसे कांटे यह राते सभी ,
नही होश में थे , कहा जा रहे थे ,
नही थी हमको ख़बर , क्यों गा रहे थे ,
के पागल हुए हम अभी , जो हदों से गुज़र गए |

उनकी एक अदा पर हम क्या कर गए ,
दीवानगी की हद से हाय गुज़र गए |

उनकी शोखियों से हम थे थोड़े अजनबी ,
वफाओ से टकरा गए हम , सोचे थे जो न कभी ,
क्या होती है मुहब्बत , यह हमने था न जाना कभी ,
यकीन पा रहे थे या शरमा रहे थे ,
सुकून मिल रहा था , जो दिल पा रहे थे ,
के बातें करते , मुस्कुराते , वादे कर गए |

उनकी एक अदा पर हम क्या कर गए ,
दीवानगी की हद से हाय गुज़र गए |

H.P.RAHI

One of My Favourite ( Ghazal )

शुक्रिया के हमारे अंजुमन में आप आए है ,

सब ओर बरस रहे है जलवे , के सरकार आए है |

तुम्ही से रोशन हर महफिल , तुम्ही से रोशन हर लम्हा ,

के आज की शब रौशनी में नहाने यहाँ महताब आए है |

सरफरोशी कि तमन्ना थी हमारे दिल में भी ,

मगर अब करेंगे गुलामी आपकी , के आप शम्मे बहार लाये है |

दास्ताने सिफर सुनाते थे जो पैमाने कभी ,

वोह आज ख़ुद नशे में डूबने कि गुहार लाये है |

अंजुमन – सभा , शब् – रात , महताब – चाँद , सिफर – शुन्य |

H.P.RAHI

My First Ghazal

सबकी सांसे सबका जीवन , मेरा जीवन तुम ही साजन |

मेरा क्या है , क्या मैं बताऊ , मेरा जीवन तेरा साजन |

भंवरा जैसे फूल बिना है , मेरा जीवन तुम बिन साजन |

देर लगी क्यो तुमको इतनी ,तेरी तलाश में भटका जीवन |

बहुत तलाशा मैंने इसको , तुझमे मिला है मेरा जीवन |

H.P.RAHI