aag ho jaye ( Ghazal )

ज़माने से कुछ तो सवाब हो जाये
दीवाने का इश्क़ में मुकाम हो जाये

कई रोज़ हो गए है तमाशा गुज़रे
चर्चा-ए-सरे-आम का इन्तेज़ाम हो जाये

शर्त ये थी के ख़त्म न होंगे
ज़ुल्म तेरे सभी शराब हो जाये

तुझको इतनी तो खबर रही होगी
ये पयामो की आरज़ू थी, आग हो जाये । H.P.RAHI

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