ab talak
जब भी देखता रहता हूँ तारे आसमानी कालिख में ,
कुछ नीली सी याद उस ओर से गुज़रती है ,
जहाँ नदी के दोनों छोरो पर दो पत्थरो जैसे इंसान ,
हां पत्थरो से ही थे वोह ,
चुप चाप बैठे है ,
इसी आसमानी कालिख के साये तलक ,
शाम से रात का सफ़र करते है ,
नदी बहते हुए भी थमी सी रहती है वहा ,
जैसे वक़्त थमा हो सफ़र कर के भी ,
यु शाम से रात होना , नीले का कालिख होना ,
मेरी रूह में दो छोरो पे अटका है |
मेरा रंग अब तलक तेरे रंग से मिलने की फरियाद में है |
H.P.RAHI

हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
Bravo…..!!!!
upto my readings of your writings
this is the deepest one…..