ab talak

जब भी देखता रहता हूँ तारे आसमानी कालिख में ,
कुछ नीली सी याद उस ओर से गुज़रती है ,
जहाँ नदी के दोनों छोरो पर दो पत्थरो जैसे इंसान ,
हां पत्थरो से ही थे वोह ,
चुप चाप बैठे है ,
इसी आसमानी कालिख के साये तलक ,
शाम से रात का सफ़र करते है ,
नदी बहते हुए भी थमी सी रहती है वहा ,
जैसे वक़्त थमा हो सफ़र कर के भी ,
यु शाम से रात होना , नीले का कालिख होना ,
मेरी रूह में दो छोरो पे अटका है |
मेरा रंग अब तलक तेरे रंग से मिलने की फरियाद में है |

H.P.RAHI

    • Viren
    • October 4th, 2011

    Bravo…..!!!!
    upto my readings of your writings
    this is the deepest one…..

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