ek baat yu huyi ( Ghazal )
एक बात यु हुयी ,
सहर के वक़्त शाम हुयी |
वोह धुप का सामान निकला ,
उस और मुड़ा और रात हुयी |
एक ख्वाब सरे आम हुआ ,
एक जुस्तजू नीलाम हुयी |
जब धड़कन की साँस चली ,
एक आह उडी , और राख हुयी |
H.P.RAHI
एक बात यु हुयी ,
सहर के वक़्त शाम हुयी |
वोह धुप का सामान निकला ,
उस और मुड़ा और रात हुयी |
एक ख्वाब सरे आम हुआ ,
एक जुस्तजू नीलाम हुयी |
जब धड़कन की साँस चली ,
एक आह उडी , और राख हुयी |
H.P.RAHI
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
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