Hum hi hum na rahe ( Shayri )
हाय उल्फत ए मुसीबत, जब भी पड़ी , भारी पड़ी ,
तुम तो आखिर तुम ही थे , हम ही हम न रहे | H.P.RAHI
हाय उल्फत ए मुसीबत, जब भी पड़ी , भारी पड़ी ,
तुम तो आखिर तुम ही थे , हम ही हम न रहे | H.P.RAHI
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
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