khwahishe ( shayri )
कभी जीते थे मुफलिसी में ,
अब भी जीते है मुफलिसों से ,
हाये , हजारो ख्वाहिशे ऐसी | H.P.RAHI
मुफलिसी – गरीबी |
कभी जीते थे मुफलिसी में ,
अब भी जीते है मुफलिसों से ,
हाये , हजारो ख्वाहिशे ऐसी | H.P.RAHI
मुफलिसी – गरीबी |
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
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