manhusiyat ( Shayri )
वोह रहगुज़र मेरी रहगुज़र रहे ,
साथ चलने से कुछ इत्तेफाक हो जाते है |
अपनी मनहूसियत की चर्चा करता फिरता हूँ ,
साथ चलने वाले कुछ करम कर जाते है |H.P.RAHI
वोह रहगुज़र मेरी रहगुज़र रहे ,
साथ चलने से कुछ इत्तेफाक हो जाते है |
अपनी मनहूसियत की चर्चा करता फिरता हूँ ,
साथ चलने वाले कुछ करम कर जाते है |H.P.RAHI
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
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