Mehfooz ( Shayri )
कुछ इस तरह बह गए हम आखो से खू बनकर ,
तेरे तसव्वुर में रहते भी तो क्या महफूज़ होते ? H.P.RAHI
कुछ इस तरह बह गए हम आखो से खू बनकर ,
तेरे तसव्वुर में रहते भी तो क्या महफूज़ होते ? H.P.RAHI
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
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