siyasat ( Ghazal )

कुछ वबा सी हर ओर महक रही है
मेरे वतन में आजकल सियासत उबल रही है

कई से बा-अदब , कई से बे-अदब
आबरू ए हर आम उछल रही है

कुछ तख़्त नशीनो से कुछ तख्ते आशिक़ों तक
रोज़ खैरातें तिलिस्म बट रही है

कौन जागे , क्यों ही जागे , क्या पड़ी है
जिंदगी को सब तजुर्बा है , सो चल रही है ।

वबा – महामारी , सियासत – राजनीती , बा-अदब – इज्जत के साथ, बे-अदब – बेइज्जती के साथ , तख़्तनशीन – गद्दी पर काबिज

H.P.RAHI

Tera Sath

Wrote for the dearest friend Vishal Chaudhary on his Engagement –

वक़्त गुज़रता रहा जैसे
शिद्दत और बढ़ती रही वैसे
एक जूनून हो गया था तुझे पाना
आज जब वोह ख्वाब मुकम्मिल हुआ
तो लगा जैसे जूनून ख़तम नहीं हुआ
शिद्दत अभी पूरी नहीं हुई , और भड़की है
जैसे शोलो को हवा दे दी हो किसी ने
यह मंज़िल नहीं है मेरे लिए
रास्ता अभी और भी है
बस अकेले चलना मुनासिब नहीं था
तेरा साथ मिला तो लगा जैसे
मुश्किलें कम तो नहीं पर आसान हो गयी है ।

H.P.RAHI

nira chand

इतना आसान नहीं लहू रोना
दिल है जो धड़कने का सबब जानता है
क़त्ल हो जाता जमानो पहले
ये निरा चाँद मगर कब मानता है

H.P.RAHI

furqate yaar hai

फुरक़ते यार है , दिल कैसे भुलाओगे उन्हें
यु खुले जख्म , भला कैसे छुपाओगे उन्हें

ऐसे बिखरे है फिज़ाओ में जफ़ाओ के समां
जैसे सहराओ में भटकी हुई गुलशन की दुआ
जैसे छिल जाते है जिस्मो में उम्मीदों के निशां
कितने वादों के सिले कैसे निभाओगे उन्हें
फुरक़ते यार है

टुकडो टुकडो में बटी फिरती है हर रात यहाँ
जैसे काटे नहीं कटती कभी माज़ी की खिज़ा
जैसे होती ही नहीं उम्रे अज़ाबो से रिहा
क्या पुकारेगी सदा क्या ही सुनाओगे उन्हें
फुरक़ते यार है

फुरक़त – विरह , जफा – अन्याय , सहरा – रेगिस्तान , माज़ी – अतीत , खिजा – पतझड़ , अज़ाब – पीड़ा

H.P.RAHI

daur

दौर वो भी था
दौर ये भी है
कल भी गुज़रा था
आज भी कहा ठहरा है
रात की खामोश निगाहें
बस सुबह तलक जागेंगी
फिराक है फिराक ही सही
गमे यार के चंद रोज़ा
उम्र तलक क्या साथ आयेंगे
ज़िन्दगी रिंदगी से बहोत अलग होती है
तुम भी जानते हो तुमको भी खबर है
बस एक गर्द सी तुमने बिछा रखी है
जब भी साँस आये , या जिंदा हो आओ तुम
तो मुड के देखना पीछे
तुम्हारी बस एक नफ़स से उड़े गर्दे गुबार के सिवा
कुछ नज़र शायद ही आये तुम्हे ।

H.P.RAHI

furqate-e-yaar ( Shayri )

नज़्म कुर्बान कर दी , बस एक रात के लिए ,
नींद खा जाती , कागज़ पे जिंदा उतर आती जो ,
नज़्म का क्या है , कल फिर रूबरू हो आएगी ,
फुरकते यार है , नींद कहा रोज आएगी ।

H.P.RAHI

tasavvur ( Ghazal )

गुमशुदा मिल गया वजुद मेरा ,
सरे राह जो खोया था जानशीं मेरा ।

तिरे जहां में कुछ तो मिला मुझे ए खुदा ,
वोह तसव्वुर के इरादों का नज़ारा मेरा ।

बंदिशे इश्क फ़साने को जाने क्या कहिये ,
बंदिशों का करम ही तो है मुकद्दर मेरा ।

तुमको देखे के शबे आफताब देखे ,
क्या क्या नहीं है आज जमाना मेरा ।

ख़ुशबुओ की चमन को आहट है ,
सुनते रहिएगा आप आज फ़साना मेरा ।

रूबरू देखा जो सहरा-ओ-समंदर मैंने ,
याद आ गया वोह मिलन था जो तुम्हारा मेरा ।

H.P.RAHI

jakhm jab ashko ko pi leta hai ( Ghazal )

जख्म जब अश्को को पी लेता है ,
जिंदगी को तमाम जी लेता है ।

वक़्त हो जाता है बदनाम खुद ही ,
बिजलिया जब कलियों पे गिरा देता है ।

तनहा तन्हाईयो में एक आस फूटी जाती है ,
जब दरख्तों पे कोई नाम मेरा लिखता है ।

उनसे न कीजियेगा तुम इर्ष्या ,
कभी साकी जहर भी पी जाता है ।

सुबह होने को पल में गिनता हूँ ,
नींद में कोई आवाज़ दे के जाता है ।

दिल से मिलता नहीं किसी से मैं ,
इक लुटे घर में ऐसे क्यों कोई आ जाता है ।

नीलाम कोई क्या होगा किसी के लिए ,
ये “राही” तो हर मंजिल पे बिका जाता है ।

H.P.RAHI

Bemaani

टूटे रोशनदानो, खिडकियों की धुप को ढको जरा
यह पुराने रद्दी अख़बार भी कुछ काम आये
आते जाते नज़र ही पड़ जाये तो
चेहरे को मुस्कान, शायद , आँखों को नमी मिल जाये
कभी खबरों से लाल लाल रहा करते थे
अब उम्र हुयी तो लहू पिला पड़ गया है इनका
अजीब सी बू भी आती है
बूढी अम्मा हमेशा चिल्लाती रहती है
“किसी रद्दी वाले को बेच दो ”
कैसे बेच दू ? इनमे से ही किसी अखबार में
बाबूजी का शोक सन्देश छपा था
मुन्ने का नाम भी आया था
साइंस फेयर में डिस्ट्रिक्ट लेवल पर फर्स्ट जो आया था
फुर्सत रहती नहीं के छाटू और फिर काटू वोह सब खबरे
एक क़र्ज़ भी है इन रद्दी कागजों का मुझ पर
मेरी कई नज्मो का बोझ लिया था इन्होने
जाने कितने मानी , बेमानी से बिखरे पड़े होंगे
सोचता हूँ के कभी मिलेगा वक़्त मुझे जरूर
तो छाटूंगा , काटूँगा सब खबरे
समेटून्गा मानी बिखरे हुए सारे
उस दिन किसी पहाड़ पे जाके राकेट बनाकर उडा दूंगा
और जहाज बना कर जमुना में बहा दूंगा
शायद किसी सुलगती खबर को थोड़ी सी नमी मिल जाये
किसी पुरानी उम्मीद को हवा मिल जाये ।

H.P.RAHI

pehchan..

मैं हवा हूँ..या हूँ माटी?

मैं हूँ जीवन..या हूँ काठी?

मैं ख्याल हूँ..या हूँ सपना?

मैं पराया हूँ..या हूँ अपना?

मैं स्पर्श हूँ..या हूँ चुभन?

मैं मुट्ठी हूँ..या हूँ गगन?

मैं हंसी तेरी..या नमकीन जल?

मैं ज़िन्दगी तेरी..या बस इक पल?

तू जानती नहीं मुझे..या में तुझसे बना?

हर पल है मेरा..कुछ अर्थ नया।

 

– DT

ये रंग रंगीली दुनिया

इस रंग रंगीली दुनिया में, हर इन्सां है बदरंग
फिर भी देख ऐ मन बावरे, हर कोई खेले है सतरंज
सुना बहुत है, है दुनिया कोई इश्क वालों की, जहाँ है सुकूं
यहाँ तो बस करते देखा इन्सां को अपनों का ही खूं
क्या सच है और क्या है भरम, ये कौन है बता पा रहा
हर जगह देखो इक कठपुतली, इक कठपुतली है नचा रहा।

– DT

main kalakar

उस सूखे कुए में मुझे चाँद टुकडो में पड़ा मिला ,
खुदखुशी करने चला था , किरचे बिखरी पड़ी थी हर ओर ,
कुछ बुझी सी थी , कुछ में अभी थोड़ी रोशनी बाकि थी ,
पूनम का होगा जब कूदा होगा , घट के चौथे का नज़र आता है ,
मैंने अपने कैनवास पर उस रात एक सूरज भी उगाया था ,
जो सुबह होते होते शाम हो गया ,
सिर्फ पीछे छुटे झुलसे कुछ निशान ,
मेरी जमा पूंजी , यह झुलसे उम्रे निशान ,
मैं कलाकार , मेरे साथ बस एक चौथे का चाँद ।

H.P.RAHI

ek karaar ki jid pe ( Ghazal )

मुझे खौफ है , किसी दिन , मेरी दास्ता तक न होगी ,
निकलेगा चाँद तब भी , एक करार की जिद पे |

कब से थी नज़र को , सदियों की बदनसीबी ,
फिर जला आशियाना , मेरे ऐतबार की हद पे |

रही खुदाई परेशां , एक सवाल की अरज से ,
मैं गुज़रा कई सहरा , एक जवाब की तलब पे |

कातिल का नाम कैसे , निकले मेरी जुबा से ,
ता उम्र बस गया वोह , आवाज़ की लरज़ पे |

H.P.RAHI

Tuj bin kaise? kyo? kisliye?

तुज बिन कैसे? क्यों? किसलिए?
वादे पे क्यों? जिए मरे रोये ?
कोई ख्याल , क्यों सताए? किसलिए?
आसू सूखे तो खून क्यों रोये ?

ढूंढा किये समंदर वोह ,
सहराओं में भटके यो ,
बेजा तलाशी आसमान में ,
नोच गिराए तारे क्यों ?

शोले जले , राख हो गए ,
शब् भर जागे , झुलस गए ,
राख मलकर घावो पर ,
झुलसा दिए फिर शोले क्यों ?

H.P.RAHI