Remembering Jagjit Singh JI

Remembering Jagjit Singh JI at Sirifort Auditorium, Delhi with Gulzar, Bhupinder and Mitali.

वोह लम्हा जो धुंधला अब भी मौजूद है ,
कोई धकेल देता है उसे जब आगे ,
मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है उस बार की तरह ,
आज भूपिंदर की आवाज़ मुझे फिर वही ले गयी ,
जहा तुमने सिर्फ गुनगुनाया था थोडा सा ,
और पब्लिक ने तुम्हे आगे गाने न दिया ,
खुद गाया था , “होठो से छु लो तुम”,
एक रूहानी सफ़र था वोह ,
और हजारो ने साथ निभाया था | H.P.RAHI

salaam jaipur 2

Wrote after coming back to jaipur from kashmir trip in summer’11

हम पहुचे थे बड़ी जिद के साथ वादी ए कश्मीर ,
बहोत खुबसूरत है माना हमने, वादी ए कश्मीर ,
मगर हमें तो ज़िन्दगी की नमी इन लू के थपेड़ो में ही वापस मिली |H.P.RAHI

ek khwab hi to hai

एक ख्वाब ही तो है ,
रात कट जाती है मेरी , तेरा क्या जाता है ?
क्यों हर बार आकर शीशे तोड़ जाता है ?

जब होता हूँ उस मोड़ पर ,
जहा से रेल की पटरी गुज़रती है ,
जिस पर कभी एक ट्रेन गुजरी थी ,
किसी मुसाफिर की आमद का वक़्त भी हुआ था ,
हर बार सोचता हूँ , हवा के पंख पकड़ कर ,
चंद मील मैं भी सफ़र कर लू ,
मैं हाथ बढ़ाता हूँ तो तेरा क्या जाता है ?
क्यों हर बार आकर शीशे तोड़ जाता है ?

रात को जब उजाले जागते है ,
तब एक दूर जाते खुशबु से साए का ,
देर तक का पीछा करते करते ,
कुछ दहलिज़े ज़माने के पार जाता हूँ ,
कभी कभी चाँद के उस ओर भी जाता हूँ ,
तेरे बदन तक वक़्त भर में पहोच पाता हूँ ,
तेरी बाहों तक आता हूँ तो तेरा क्या जाता है ?
क्यों हर बार आकर शीशे तोड़ जाता है ?

कभी कही नहीं जा पाता , कभी दूर तक निकल जाता हूँ ,
एक ख्वाब ही तो है , तेरा क्या जाता है ?

H.P.RAHI

kaisa lagta hai

तुम आग में जले हो कभी , तुम बार बार मरे हो कभी ?
तुम जब कही नहीं थे तब कहा पर थे ?
कौन राह चले थे जब रुके रुके से थे ?
ख़ामोशी को सुन कर देखा है, कैसा लगता है ?
यह अँधा कुआ झाका है कभी , कैसा लगता है ?

सन्नाटो के शहर में आकर , धुन कोई छेड़ी है कभी ?
पत्थरो के जंगलो में नदी बनकर बहे हो कभी ?
आसान से जो नज़र आते है , इरादे जिए है कभी ?
कभी सूरज को पीकर देखा है , कैसा लगता है ?
कभी चाँद चुरा के देखा है , कैसा लगता है ?

जब जंग छिड़ी थी बागीचे में , तुमने भी कुछ फूल तोड़े थे ,
कुछ सफिने तुमने भी डुबोये थे , कुछ राहे तुमने भी तनहा छोड़ी थी ,
क्या सोचा है कभी , उस पार क्या बिता है वक़्त अब भी ?
रूठे हुए कुछ साये , सूखे हुए पत्तो जैसे कुछ साये ,
जिन्दा साये , मुर्दा साये , उस पार क्या बिता है वक़्त अब भी ?
कभी मुड़कर पीछे देखा है , कैसा लगता है ?
कोई छोटा सा वादा भी जीकर देखा है , कैसा लगता है ?

H.P.RAHI

ab talak

जब भी देखता रहता हूँ तारे आसमानी कालिख में ,
कुछ नीली सी याद उस ओर से गुज़रती है ,
जहाँ नदी के दोनों छोरो पर दो पत्थरो जैसे इंसान ,
हां पत्थरो से ही थे वोह ,
चुप चाप बैठे है ,
इसी आसमानी कालिख के साये तलक ,
शाम से रात का सफ़र करते है ,
नदी बहते हुए भी थमी सी रहती है वहा ,
जैसे वक़्त थमा हो सफ़र कर के भी ,
यु शाम से रात होना , नीले का कालिख होना ,
मेरी रूह में दो छोरो पे अटका है |
मेरा रंग अब तलक तेरे रंग से मिलने की फरियाद में है |

H.P.RAHI

ek baat yu huyi ( Ghazal )

एक बात यु हुयी ,
सहर के वक़्त शाम हुयी |

वोह धुप का सामान निकला ,
उस और मुड़ा और रात हुयी |

एक ख्वाब सरे आम हुआ ,
एक जुस्तजू नीलाम हुयी |

जब धड़कन की साँस चली ,
एक आह उडी , और राख हुयी |

H.P.RAHI

ehsaan ( Ghazal )

शाम मुझपे एहसान करती है ,
रोज़ मिलती है जुदा होती है |

यु सताती है मुझे हर साँस मेरी ,
नाम लेती है और बदनाम होती है |

क्या वफ़ा , क्या उम्मीद और क्या ज़ज्बात ,
इससे बेहतर भी कोई सजा होती है ?

यु दिखती नहीं उजालो में नजारों की तरह ,
यह शमा , दिल के आइनों में अक्स होती है |

H.P.RAHI

maji

नाज़ुक मोड़ था , उसने तो बस अपना साया छुड़ा लिया ,
और मेरे हिस्से का सूरज देखता रहा , शीशे में ताकता रहा |
अब भी सुबह की धुंध में कुछ शेरो के माजी उभरते है ,
और रात वाली नज़्म जब दिनों तक साथ चलती है ,
आखों की कोरे जलती रहती है , नींदे सिर्फ सफाई देती है ,
तेरे साये का पीछा करते करते मेरे हिस्से का सूरज ,
हाफ्ने लगता है , तब बदन की तपिश से मैं चौक उठता हूँ ,
और सोचता हूँ , वक़्त की चारागरी भी क्यों काम नहीं आई ?
तुने तो बस अपना साया ही छुड़ाया था , नाज़ुक मोड़ था ,
एक कस्तूरी अभी भी मेरे पास है , जिसमे तू कैद है ,
शायद यह अंधी दौड़ है , और मुझे दौड़ते जाना है ,
मेरे हिस्से के सूरज की छाव तले |

H.P.RAHI

aapbiti

रोने दो ना ,
नज़र उठा के देखा तो को दरवाज़े में चटखनी नहीं थी ,
बंद नहीं होता है साला , अब रोऊ कैसे ?
गला सुख रहा है ,
फ्रीज़ खोल कर देखा ,
तो पानी की एक बूंद तक न थी ,
बस २ बीयर की बोटल , भरी हुयी |
पिने दो ना |
कंप्यूटर पे बैठा हूँ मैं इस वक़्त ,
उस फोल्डर तक ना जाने कैसे , लेकिन पहोच गया ,
जहा पर कैद है एक हिडन जुस्तजू-ए-जिंदगी ,
डिलीट तक हड्डिया जाती नहीं ,
प्लीज़, रहने दो ना |H.P.RAHI

yaad

तू याद बहोत आया कल रात ,
और रात थी जो ख़तम ही न हुयी |

ऐसे सितम सहता हूँ हर रात ,
और एक तेरी आमद है , हर बार टलती रही |

एक आहट से भी तेरी जो सुकून मिलता था मुझे ,
वोह आहटे ही मेरे दिल का घाव हुयी |

थोडा और , थोडा और , थोडा और इंतज़ार ,
कुछ ही सासों की बात है , अटकी हुयी | Deeps

raat ki ek baje

क्यों ग़मज़दा है हर बात आज रात की ,
क्या अब भी बरक़रार है वोह शाम की बारिश ,
जो तिनको की तरह आखो में चुभी जा रही थी |
न जाने क्यों , वो शाम ढल गयी , आधी रात भी हो गयी ,
क्यों ढूंढता रहता हूँ तुझे चेट लिस्ट में रात की एक बजे ,
तू तो कबकी जा चुकी ,
आशा करता हूँ तेरा तकिया ,
मेरी पिछली नज़्म वाला चाँद होगा |
पलटना तेरा जरूरी क्यों था ,
क्यों मेरा ऐसा सोचना जरूरी है ,
कई सवाल है , कोई जवाब भी होगा ,
आखो के आईने पे नोट कर लिए है ,
तुझसे पूछुंगा , जब मिलूँगा ,
पढ़ लेना , अगर आँखे मिल जाये तो |

H.P.RAHI

gubaar (गुबार)

जब बारिश में भीगते हुए भी जिया जलता है ,
और रिम जिम जब धुआ भी उठने नहीं देती ,
तब कुछ असीर अरमानो की बेडिया टूटने लगती है ,
और याद आता है वोह ख्वाब ,
जिसे बुनते मुझे पुरे दो साल लगे थे ,
और टूटने में वोह कुछ पल ,
ओ साथी रे , दिन डूबता है , रात होती है ,
तू होती नहीं , फिर भी होती है ,
तेरा जाना होता ही नहीं कभी |

इस “राही” का है सफ़र तनहा ,
और सिफर इसकी मंजिल ,
यु मंजिल का भरम मत बन ,
बारिश में जिया जलने की सजा तो न दे |

असीर – कैद , सिफर – शुन्य |

H.P.RAHI

do bhatke hue musafir

दो भटके हुए मुसाफिर ,
उस मंजिल की ओर , जिसका न कोई साहिल न कोई छोर ,
जाने क्या देखते , क्या सोचते , क्या गाते हुए बढे जाते है ,
दो भटके हुए मुसाफिर ,
साथ है फिर भी , एक डोर से बंधे ,
किसी रिश्ते की डोर तो नहीं लगती है लेकिन ,
किस धागे की डोर है ये फिर ?
शायद किसी कसम की ,
साथ चलने की कसम , उस अनजान मंजिल की ओर ,
जहा पर कुछ मिले भी तो शायद , साथ के सिवा कुछ न मिले ,
दो भटके हुए मुसाफिर ,
हवाओ पे पाँव रखते , बादलो के पार चले ,
आसमान के आगे , चाँद के पार चले ,
उन्हें वोह आग का दरिया चाँद के पार ही मिल जाये शायद ,
वोह आग का दरिया ही इनकी मंजिल हो |
कोई कहता है , इश्क एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ,
पर हमें तो इश्क के सिवा कही नहीं जाना है ,
बस इसी दरिया में ही डूब जाना है |
दो भटके हुए मुसाफिर ,
उस मंजिल की ओर , जिसका न कोई साहिल न कोई छोर |

H.P.RAHI

tera muslman hona

आज कुछ पुराने ख़त टटोल रहा था ,
जिंदगी की ताजगी से भरी उन यादो को ,
फिर से जीने चला था |
कितने रंग बिखरे हुए थे उन सफ़ेद कागजो पर , जिंदगी कितनी रंगीन थी ,
कभी तेरी शिकायत ने मुझसे नज़र भर ली ,
कभी रुलाई तेरी मेरे लबो पे इनाम बन गयी ,
और कभी तेरे खून के धब्बे देख मेरी सासे तेज़ हो गयी ,
कितनी शिद्दत थी जो भी करते थे , मौसिकी हो जैसे सास लेना भी ,
लबरेज़ ख्वाबो से चश्म , दिखाई भी वही देता था जो चाहते थे ,
ज़माने भर का ज़ज्बा अपनी जेब में लेकर महोब्बत करते थे |
कुछ चुभा शायद , एक चूड़ी का टुकड़ा छुपा बैठा था उस कागज़ के पीछे ,
एक दाग तेरे खूं के आगे मेरा भी लग गया , लाल से लाल मिल गया ,
और एक ज़ख्म फिर से हरा हो गया |
मेरे गुनाह का भागिदार यह समाज था भी, नहीं भी ,
वोह बात अनसुनी कर देता तो क्या बिगड़ जाता ,वैसे भी अब कहा कुछ सुनाई देता है ,
धड़कन से लेकर ज़मीर तक की आवाज़ दब के रह जाती है मेरे दंभ के शोर में ,
इस समाज के ठेकेदारों में अब मैं भी तो गिना जाता हूँ |
तुझसे वोह आखरी मुलाकात अब भी धुंधली नहीं हुयी मेरे जहन में ,
मेरी हमनफस मुझे माफ़ करना , तेरे कद से मेरी लम्बाई छोटी पड़ गयी थी ,
सारा साहस बस उस शाम दरिया में बह गया था ,
तेरा मुसलमाँ होना मेरी महोब्बत पर भारी पड़ गया था |

H.P.RAHI