phir nayi phursate ( Ghazal )
एक ख्वाब की बख्शीश को संभाले , फिर नयी फुरसते …
घूमते रहें एक रात ओढ़े हुए चुपके से ,
यादो की गलियों से कुछ कदमो के निशान चुराए |
फिर नयी फुरसते…
चाँद बांधे मुट्ठी में तारो से जगडा किये ,
कुछ टुकड़े चांदनी के धुप में सुखाये |
फिर नयी फुरसते…
फिर उन्ही पानियों में हम नमक थामे रहे ,
लम्हों के वादे, सदियों में निभाए |
फिर नयी फुरसते…
H.P.RAHI

हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
फिर नयी फुरसते….great
Amazing bro!!!
Superb man…
yeh shayad shabdo ka janjhal , ya phir koi damkati roshni hain,
yeh tajgi bhari tumhari ghajal hain , ya phir ! phir nayi phuraste hain
good job
@Viren Pandya
Mere bhai abhi Phursato ki to talash hai , philhaal yeh sirf ek ghazal hai
Pandya ne bahut achhhi ghajhal likhi h!!!
Superb Man…. Yaar quite impressive…