savan ( shayri )
याद आती है वोह आग बहोत , जिसे बुझे हुए ज़माने हो गए ,
के कभी सावन बीत जाया करता था हर बरस , और अंगारे फिर भड़क उठते थे | H.P.RAHI
याद आती है वोह आग बहोत , जिसे बुझे हुए ज़माने हो गए ,
के कभी सावन बीत जाया करता था हर बरस , और अंगारे फिर भड़क उठते थे | H.P.RAHI
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
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