shauk ( Shayri )
तेरे दरे आस्ता , सबब बेकसी मेरी ,
गर मैं तेरी जरूरत नहीं , तो तेरा शौक ही सही | H.P.RAHI
तेरे दरे आस्ता , सबब बेकसी मेरी ,
गर मैं तेरी जरूरत नहीं , तो तेरा शौक ही सही | H.P.RAHI
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
Shauk mera zaroori toh nahi , tujhse toh mera rasta
Darwaje pe khada hoon , ab manjil se door nahi.