siyasat ( Ghazal )

कुछ वबा सी हर ओर महक रही है
मेरे वतन में आजकल सियासत उबल रही है

कई से बा-अदब , कई से बे-अदब
आबरू ए हर आम उछल रही है

कुछ तख़्त नशीनो से कुछ तख्ते आशिक़ों तक
रोज़ खैरातें तिलिस्म बट रही है

कौन जागे , क्यों ही जागे , क्या पड़ी है
जिंदगी को सब तजुर्बा है , सो चल रही है ।

वबा – महामारी , सियासत – राजनीती , बा-अदब – इज्जत के साथ, बे-अदब – बेइज्जती के साथ , तख़्तनशीन – गद्दी पर काबिज

H.P.RAHI

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