aag ho jaye ( Ghazal )

ज़माने से कुछ तो सवाब हो जाये
दीवाने का इश्क़ में मुकाम हो जाये

कई रोज़ हो गए है तमाशा गुज़रे
चर्चा-ए-सरे-आम का इन्तेज़ाम हो जाये

शर्त ये थी के ख़त्म न होंगे
ज़ुल्म तेरे सभी शराब हो जाये

तुझको इतनी तो खबर रही होगी
ये पयामो की आरज़ू थी, आग हो जाये । H.P.RAHI

dil dil se ja mila ( Ghazal )

दिल दिल से जा मिला
जख्मो की फिकर है क्या

ना ज़माने की बात कर
तर्क-ए-दिल सुनेगा क्या

बेतकल्लुफ़ जो है आपसे
नज़रो की खता है क्या

हो गयी हर अदा बेहुनर
चिलमन को उठाया है क्या

एक वफ़ा एक अहद के सिवा
कुछ गरज़ दिल करे और क्या | H.P.RAHI

raaj ( Ghazal )

आप हमसे यु खफा होते है
महफ़िलो में भी कही राज़ बयां होते है

मेरी नज़्मों में उन आँखो का ज़िक्र रहता है
मयकदो के यु सभी क़र्ज़ अदा होते है

तेरी जानिब कुछ फासले सा बढ़ता हूँ
सूखे हुए फूल जब किताबो से रिहा होते है | H.P.RAHI

yaad aaya na karo ( Ghazal )

तुम इतना मुझे याद आया न करो
दिल बड़ा कमजोर है, इस तरह बुलाया न करो

साँसों का सफ़र बाकि है ज़रा सा ही और
उन पुराने वास्तो की धूल यु उडाया न करो

क़र्ज़ रातो के अभी बाकि है बहोत सारे
आकर यु ख्वाबो में तुम मुझको जगाया न करो

मेरी गजलो के हर्फ़ है सब हाँफते हुए,
ये बाते तुम युही हँसी में उड़ाया न करो | H.P.RAHI

tumne kab se sikh liya ( Ghazal )

तुम तो मेरे थे हमेशा , क्या गज़ब तुमने किया
लोगो की बातों में आना , तुमने कब से सिख लिया

एक करम की थी गुज़ारिश , एक रहम की थी उम्मीद
आ के तेरे शहर में , क्या गलत हमने किया

कितने मयखाने जले और कितनी सदियों के जगे
क्या रखे इनका हिसाब , जो दिया तुमने दिया

शाम के पतजड़ बीने थे मौसमो की याद में
रात की बारिश ने सब तिनको को फिर तूफां किया ।

H.P.RAHI

karz ( Ghazal )

मौसमें गुल है अभी इसको गुज़र तो जाने दो
ऐ बहारो मुझको मेरे माज़ी से मिल जाने दो

आसमानो से परिंदे अलविदा कहते किसे है
जंगलो के राज है सब राज ही रह जाने दो

तेरे शहर के बाशिंदे कुछ मेरे गाँव में ठहरें हुए है
सितारो बादलो से निकलो ज़रा कुछ रोशनी हो जाने दो

सहराओं के कर्ज़ कितने थमती थमती साँसो पे है
जागती आखों के सागर कुछ छलक तो जाने दो ।

H.P.RAHI

dil karta hai ( Nazm )

लहू दिल से खरोंच लू
दिल करता है
क़त्ल हो जाना मुश्किल है
कौन कहता है ?
टूट के बिखर जाये कभी
उस दहलीज़ पे जाकर
रश्क हो जाये उन्हें मुझपे
मन होता है |
बेशुमारी शामिल थी
हर चीज़ में अपनी
बेहयाई भी होती कुछ
कितना सहता है ?

H.P.RAHI

jalte hue khat ( Ghazal )

दिलजले दिल यु खुदाओं की खुदाई रोए
जलते हुए खत ज्यो असीरी की रिहाई रोए

दर्द-ए-चारागिरी तो वस्ल-ए-मयख़ाने में थी
और हम बस एक मुलाक़ात की दुहाई रोए

तजरूबा खूब रहा उल्फत-ए-मुसीबत का
लोग क्यों खाम्ख्वा यार-ए-जुदाई रोये

जाने कितने हिसाब होने को थे लेकिन
जिंदगी बस वक़्त को ही गवाही रोये |

असीरी – कैद , चारागिरी – इलाज़ , वस्ल – मिलन

H.P.RAHI

siyasat ( Ghazal )

कुछ वबा सी हर ओर महक रही है
मेरे वतन में आजकल सियासत उबल रही है

कई से बा-अदब , कई से बे-अदब
आबरू ए हर आम उछल रही है

कुछ तख़्त नशीनो से कुछ तख्ते आशिक़ों तक
रोज़ खैरातें तिलिस्म बट रही है

कौन जागे , क्यों ही जागे , क्या पड़ी है
जिंदगी को सब तजुर्बा है , सो चल रही है ।

वबा – महामारी , सियासत – राजनीती , बा-अदब – इज्जत के साथ, बे-अदब – बेइज्जती के साथ , तख़्तनशीन – गद्दी पर काबिज

H.P.RAHI

furqate yaar hai ( Ghazal )

फुरक़ते यार है , दिल कैसे भुलाओगे उन्हें
यु खुले जख्म , भला कैसे छुपाओगे उन्हें

ऐसे बिखरे है फिज़ाओ में जफ़ाओ के समां
जैसे सहराओ में भटकी हुई गुलशन की दुआ
जैसे छिल जाते है जिस्मो में उम्मीदों के निशां
कितने वादों के सिले कैसे निभाओगे उन्हें
फुरक़ते यार है

टुकडो टुकडो में बटी फिरती है हर रात यहाँ
जैसे काटे नहीं कटती कभी माज़ी की खिज़ा
जैसे होती ही नहीं उम्रे अज़ाबो से रिहा
क्या पुकारेगी सदा क्या ही सुनाओगे उन्हें
फुरक़ते यार है

फुरक़त – विरह , जफा – अन्याय , सहरा – रेगिस्तान , माज़ी – अतीत , खिजा – पतझड़ , अज़ाब – दुःख

H.P.RAHI

tasavvur ( Ghazal )

गुमशुदा मिल गया वजुद मेरा ,
सरे राह जो खोया था जानशीं मेरा ।

तिरे जहां में कुछ तो मिला मुझे ए खुदा ,
वोह तसव्वुर के इरादों का नज़ारा मेरा ।

बंदिशे इश्क फ़साने को जाने क्या कहिये ,
बंदिशों का करम ही तो है मुकद्दर मेरा ।

तुमको देखे के शबे आफताब देखे ,
क्या क्या नहीं है आज जमाना मेरा ।

ख़ुशबुओ की चमन को आहट है ,
सुनते रहिएगा आप आज फ़साना मेरा ।

रूबरू देखा जो सहरा-ओ-समंदर मैंने ,
याद आ गया वोह मिलन था जो तुम्हारा मेरा ।

H.P.RAHI

jakhm jab ashko ko pi leta hai ( Ghazal )

जख्म जब अश्को को पी लेता है ,
जिंदगी को तमाम जी लेता है ।

वक़्त हो जाता है बदनाम खुद ही ,
बिजलिया जब कलियों पे गिरा देता है ।

तनहा तन्हाईयो में एक आस फूटी जाती है ,
जब दरख्तों पे कोई नाम मेरा लिखता है ।

उनसे न कीजियेगा तुम इर्ष्या ,
कभी साकी जहर भी पी जाता है ।

सुबह होने को पल में गिनता हूँ ,
नींद में कोई आवाज़ दे के जाता है ।

दिल से मिलता नहीं किसी से मैं ,
इक लुटे घर में ऐसे क्यों कोई आ जाता है ।

नीलाम कोई क्या होगा किसी के लिए ,
ये “राही” तो हर मंजिल पे बिका जाता है ।

H.P.RAHI

ek karaar ki jid pe ( Ghazal )

मुझे खौफ है , किसी दिन , मेरी दास्ता तक न होगी ,
निकलेगा चाँद तब भी , एक करार की जिद पे |

कब से थी नज़र को , सदियों की बदनसीबी ,
फिर जला आशियाना , मेरे ऐतबार की हद पे |

रही खुदाई परेशां , एक सवाल की अरज से ,
मैं गुज़रा कई सहरा , एक जवाब की तलब पे |

कातिल का नाम कैसे , निकले मेरी जुबा से ,
ता उम्र बस गया वोह , आवाज़ की लरज़ पे |

H.P.RAHI

ek baat yu huyi ( Ghazal )

एक बात यु हुयी ,
सहर के वक़्त शाम हुयी |

वोह धुप का सामान निकला ,
उस और मुड़ा और रात हुयी |

एक ख्वाब सरे आम हुआ ,
एक जुस्तजू नीलाम हुयी |

जब धड़कन की साँस चली ,
एक आह उडी , और राख हुयी |

H.P.RAHI

ehsaan ( Ghazal )

शाम मुझपे एहसान करती है ,
रोज़ मिलती है जुदा होती है |

यु सताती है मुझे हर साँस मेरी ,
नाम लेती है और बदनाम होती है |

क्या वफ़ा , क्या उम्मीद और क्या ज़ज्बात ,
इससे बेहतर भी कोई सजा होती है ?

यु दिखती नहीं उजालो में नजारों की तरह ,
यह शमा , दिल के आइनों में अक्स होती है |

H.P.RAHI

tu bekhabar ( Ghazal )

हर नफस मेरी एक जलन , तु बेखबर ,
कितना धड़के दर्दे जिगर , तु बेखबर |

एक जान मेरी , कब है मेरी ,
तु जाने न , तु बेखबर |

तेरी एक नज़र , तीरे नीमकश ,
तेरे दीद का इतना असर , तु बेखबर |

गाफिल “राही” , एक ही तरफ ,
तेरी रहगुज़र , तु बेखबर |

इतनी बढ़ी , के कुछ और हुयी ,
दोस्ती तेरी , तू बेखबर |

H.P.RAHI

ek katil ( Ghazal )

उठा धुआ तक नहीं जब दिल ये मेरा खाक हुआ ,
तेरी शान में गुस्ताख थी चिंगारी , जो सजा ए बेनूर हुयी |

कातिल का पता जानते हो तो पूछते क्यों हो ,
ए दर्दे जिगर मेरे, सो जाओ के बहोत देर हुयी |

शबे फुरकत में रिंद , बहोत पीना नहीं अच्छा ,
कट जाएगी यह रात , जो बेहोश न भी हुयी |

आईने तोड़ के बैठा हूँ एक पत्थर पे रक्खे सर ,
परछाई से जगडी के हाय , नज़र धुंधली हुयी |

शबे फुरकत – जुदाई की रात , रिंद – शराबी |

H.P.RAHI

thikane ( Ghazal )

लम्हा लम्हा जिंदगी के आशियाने बीत गए ,
दीवानगी में बेखुदी के वो ज़माने बित गए |

ले जा रहे हो क्या यहाँ से ? क्या मिला होगा तुम्हे ?
दीदावारे हुस्न के , मयकशी के , वोह ठिकाने बित गए |

जर्रा जर्रा जोशे जूनून खो गया , गुम हो गया ,
ए दिल तेरी जिन्दादिली के , वोह फ़साने बित गए |

बेनाम तिशनगी सताए , दिल जलाये सहरा सहरा .
ए समंदर आज तेरे वोह नज़ारे बित गए |

बेखुदी – नशे में , दीदावर – दर्शन , तिशनगी – प्यास , सहरा – रेगिस्तान |

H.P.RAHI

badnaam kinaare ( Ghazal )

गुमनाम बहारो की गुमनाम मजारे है ,
बरबस ही मिले है जो , गुमनाम सहारे है |

छुपते हुए देखा है हमने कुछ अपनों को ,
महरबान अंधेरो में महरबान दरारे है |

इक आह सी उठती है , एक दर्द सा जाता है ,
बेईमान किरदारों के बेईमान नज़ारे है |

रोते हुए पाया है कश्ती के इरादों को ,
बदनाम समंदर के बदनाम किनारे है |

H.P.RAHI

sham bhujaye hue ( Ghazal )

अरसा बिता है किसी की याद सताए हुए ,
अब भी रखता काश मैं तूफान जगाये हुए |

उसकी सोहबत में नज़ारे हसीन लगते थे ,
उसके पहलु में मुझे चाँद सितारे करीब लगते थे
अब तो जैसे सन्नाटो के शोर गूंजते रहते है
मुझको भी तो युग बीते आवाज़ लगाये हुए

अजीब दौर था , मुहोब्बत की बात करते थे,
आग के दरिया में किनारों की बात करते थे,
न जाने तिश्नगी कैसे बुझा लेती है खुद ही प्यास
जलता रहता हूँ हर रोज़ एक शाम बुझाये हुए |

तिश्नगी – प्यास |

H.P.RAHI