thaka thaka ek rahi hoo main ( Ghazal )

एक सपना देखा , कितना वोह अच्छा सपना था |
कुछ अपना भी देखा था , कितना वोह सच्चा अपना था |

ख़त कितना सुहाना था , कागज कुछ पुराना था ,
कुछ धुंधला सा कुछ उभरा सा , वोह तेरा इकरारनामा था |
बहता बहता एक आसू आया , पोछ गया कुछ स्याह को ,
कितना बेरहम यह आसू था , ले गया तेरे दिल को ,
एक यह दिल ही तो मेरा अपना था , भले कागज़ पे ही था जो ,
और तो सब कुछ धुआ धुआ सा सांस दे गया तेरे तन को |

बरबस कही एक पत्ता पाया ,
पत्ते पे कुछ अपना पाया |
मिलो उडी हवा की छाया ,
छाया में भी खुद को पाया |
राख राख एक अंगारा था ,
उडी हवा तो वोह भी छाया था |
एक बादल मस्त बदन का पाया ,
वोह भी बरसो से ना बरसा था |

इन अपनों का मिश्रण हूँ मैं ,
इन सपनो का जीवन हूँ मैं ,
वीरान मंजिल के ढांचे पर बैठा ,
थका थका एक राही हूँ मैं |

H.P.RAHI

phir nayi phursate ( Ghazal )

एक ख्वाब की बख्शीश को संभाले , फिर नयी फुरसते …

घूमते रहें एक रात ओढ़े हुए चुपके से ,
यादो की गलियों से कुछ कदमो के निशान चुराए |
फिर नयी फुरसते…

चाँद बांधे मुट्ठी में तारो से जगडा किये ,
कुछ टुकड़े चांदनी के धुप में सुखाये |
फिर नयी फुरसते…

फिर उन्ही पानियों में हम नमक थामे रहे ,
लम्हों के वादे, सदियों में निभाए |
फिर नयी फुरसते…

H.P.RAHI

shaam ( Ghazal )

शाम , पलकों में डूबी एक किताब सी लगती है ,
पत्तो पे जिसके ढलकी , शायद कुछ शराब सी लगती है |

शाम , घायल अश्को से भी घायल लगती है ,
गहराई से देखा तो यह एक हिसाब सी लगती है |

शाम , पागल दिल सी पागल , किसी बोजिल शबाब सी लगती है ,
बुझते हुए चिराग से भड़की जलती छाव सी लगती है |

H.P.RAHI

bahak jana baki hai ( Ghazal )

चले जाना के अभी इस रात का एक पहर बाकि है ,
चले जाना के अभी इस दिल का एक अरमान बाकि है |

धड़कते दिल तड़पते है , मचलते दिल तरसते है ,
चले जाना के अभी इन सब का जल जाना बाकि है |

जिस दिल को संभाले थे , हमने उसको खोया है ,
चले जाना के अभी इस नुकसान का हर्जाना बाकि है |

तेरी आँखों के पैमाने पिए हमने नहीं पुरे ,
चले जाना के अभी किसी का बहक जाना बाकि है |

H.P.RAHI

harf ( Ghazal )

सहर तक आते आते हर पल को गिनता रहा ,
मेरे दिल अजीज एक ख्वाब ने सताया बहोत मुझे |

कभी कभी अपने भी जरा कुछ काम आ जाते है ,
मेरी ग़ज़ल से टूटकर एक हर्फ़ ने सिखाया बहोत मुझे |

एक हवा रोज आखो में आ जाती है कुछ तिनके लेकर ,
मेरे वतन ने हर तरह से पुकारा बहोत मुझे |

दौड़ता रहा पीछे पीछे बहोत दूर तक रेत पर ,
कुछ कदमो के निशानों ने थकाया बहोत मुझे |

सहर – सुबह , हर्फ़ – अक्षर |

H.P.RAHI

teri baahein ( Ghazal )

तेरी बाहे सुनी राहें छोड़ कर जा चुकी होंगी ,
कही तो आग लगी होगी , कही बरसात हुई होगी |

रहा करते थे जिनकी धडकनों में हम ,
तडपता छोड़ कर जाना उनकी आदते होंगी |

उन्हें हम ग़म के मारो का मसीहा कहते फिरते थे ,
के मसीहा बन के तरसाना उनकी ख्वाहिशे होंगी |

लरबते होठो के प्याले छुआ करते थे होठो से ,
मगर दिल ही न छु पाए , यह अपनी किस्मते होंगी |

कि सागर के छलकने से यह साहिल टूट जाते है ,
कि कश्ती का बिखर जाना उनकी रहमते होंगी |

H.P.RAHI

hausla ( ghazal )

मेरा कम नहीं है हौसला , न यु अदा से मिला करो ,
मेरे घर में भी है आइना , न नज़र से इतनी दुआ करो |

मुझे ग़म नहीं किसी और का , जैसी भी यह ज़ीस्त सही ,
मुझे कह दो बेवफा मगर , न इस तरह से वफ़ा करो |

सौ बार के ग़म से बेहतर एक जान ही दे दे न क्यों ,
एक कोशिश तो पूरी होने दो , न मुझे यु साँसे दिया करो |

जीस्त – जिंदगी |

H.P.RAHI

do chand hi bo diye to kya ( Ghazal )

एक ‘राही’ भुला भटका सा , दो चार कदम पर मंजिल क्या ,
यह बहोत आम सी जिंदगी , एक उम्र जिए तो जिए ही क्या |

हर शाम थकी इन राहो को मैं घर की राह दिखाता हूँ ,
कुछ करने की यह जिद ही सही , दो ख्वाब ही देख लिए तो क्या |

खुद अपनी जमीं पे अपना आसमान उगायेंगे ,
चाहे सितारे साथ नहीं , दो चाँद ही बो दिए तो क्या |

अपने लिए सब एक बराबर जश्न का मौका होता है ,
वो रात का सन्नाटा कैसा , और दिन का पागलपन ही क्या |

H.P.RAHI

har waqt dhua sa rahta hai ( Ghazal )

हर तरफ हर वक़्त धुआं सा रहता है |
एक धुप का टुकडा डरा सा रहता है |

जब भी गुज़रा मैं जली इन बस्तियों से ,
तजरूबा मेरा बुरा सा रहता है |

आपके शहर से दोस्ती हो कैसे ,
हर शख्स कितने शख्स बना सा रहता है |

जिन्दगी एक तपिश सी क्यों है ,
जो भी जीता है , जला सा रहता है |

H.P.RAHI

nain, dil, lab ya kaish kahi koi to naraj hai ( Ghazal )

दबे दबे से गीत के पीछे जाने क्या राज है ,
क्या तुम्हारा प्यार मेरे लिए अब बिना परवाज है |

आज दर पर आहट हुयी , पर कुछ रौशनी न हुयी ,
दिल तक न पहूची यह तुम्हारी कौनसी आवाज है |

जानते है यह संसार है नापाक तो होगा ही ,
पर हमारे बीच में यह कौन जालसाज़ है |

तुम्हारे इनकार कि कुछ तो वजह होगी ,
नैन , दिल , लब या कैश , कही कोई तो नाराज़ है |

H.P.RAHI

kaarwa ghamo ka ( Ghazal )

कारवा गमो का गुजरा था मेरे दर से ,
हमारे हाथो से सागर टूटने से लगे है |

तुम्हारी दुआए हम तक पहुची ही थी ,
जिंदगी और मौत के सिरे छुने से लगे है |

भीगने लगी है जिंदगी की राहें ,
दिलो के जख्म सुबकने से लगे है |

अपने अंजुमन में क्या कमी थी आंसुओ की ,
वक़्त के कुछ और सितम जुड़ने से लगे है |

सागर – शराब का प्याला , अंजुमन – सभा |

H.P.RAHI

mera jakhm kuch aur khul gaya ( Ghazal )

मेरी तन्हाइयो का साथी मुझको मिल गया ,
तिशनगी थी इतनी कि सारा मयकदा मैं पि गया |

मेरी पहचान का कोई काफिला गुजरा था मेरे दर से ,
शहनायिओ कि आवाज थी कि मैं सारी रात जी गया |

था नहीं यकीन कि इस तरह से गुजरोगी तुम मेरे सामने से ,
उस यकीन कि मौत थी कि जशने ग़म का आलम वोह दे गया |

वोह शब् कटी के मैं कटा कुछ भी नहीं खबर ,
था चुप्पियों का शोर के मेरा जख्म कुछ और खुल गया |

तिशनगी – प्यास , शब् – रात |

H.P.RAHI

diljala ( Ghazal )

वोह यार मेरा दिलदार मेरा कुछ अनसुना सा हो गया ,
जल गए हम भी कसक में , वोह दिलजला सा हो गया |

जब समंदर से मैं गुजरा साया अपना खो गया ,
जिसकी तलाश में था मैं भटका , ये सहरा पासवा सा हो गया |

उस किरण का था ये वादा , साथ में हमसाया होगा ,
बुझना ही बाकी था जिसका , जलजला सा हो गया |

उन दिलजलो की याद में नुकसान अपना हो गया ,
जो था कभी दुश्मन सा वोह , अब मेहरबा सा हो गया |

सहरा – रेगिस्तान |

H.P.RAHI

tum bin ( Ghazal )

कैसे रहोगे तन्हा हम बिन ,
जी न सकेंगे हम भी तुम बिन |

दिल पर बोझ यादो का इतना ,
मर भी सकेंगे कैसे तुम बिन |

शाम तो कट ही गई पीते पीते ,
जाने कैसे कटेगी यह रात तुम बिन |

‘राही’ भूल रहा है अपनी मंझिल ,
बदले बदले से जो है यह नज़ारे तुम बिन |

H.P.RAHI

woh kya raat thi ( Ghazal )

वो रात भी क्या रात थी ,
तुम थे और था चाँद थोड़ा थोड़ा |

कर रहे थे प्यार मुझको ,
और था इताब थोड़ा थोड़ा |

थोडी थोडी मुहब्बत थी और ,
था तेरा नखरा थोड़ा थोड़ा |

सारी छत पे थी खुशबू महकी ,
जो था तेरा इकरार थोड़ा थोड़ा |

इताब – गुस्सा |

H.P.RAHI

aap hum me woh yarana woh muravvat kaha ( Ghazal )

रेत के महल बनते है सिर्फ़ टूटने के लिए ,
इनके इरादों में वोह माहो-साल कहा |
दे दो जवाब सवाल मुस्तकविल मेरे ,
आपके जिगर में वो हाल कहा |

हाले दिल भी कभी सुना होता ,
तड़प होती है क्या यह जाना होता |
करते थे तसल्ली किसी ज़माने में ,
दीद को भी अब वोह दीदार कहा |

भड़क उठते ये शोले कभी न बुझने को ,
जो कभी बेडियों में शबनम को बंधा होता |
अपनी चाहतो को करते खुल कर बयां पर ,
आप हममे वोह याराना वोह मुरव्वत कहा |

दीद – दर्शन ,मुरव्वत – लिहाज |

H.P.RAHI

yu rato me na milne aao ( ghazal )

मेरे मुफलिस तेरे ही दामन में सोया हूँ ,
ख़बर भी नही इतनी गुम हो , क्या मेरे ख्यालो में खोयी हो |

शब् भी बहोत लम्बी सी है ,
इसे तेरे आने की ख़बर है जो |

तन मन में इतना शोर मचा है ,
आज सिने में जैसे दो दिल हो |

तुमको रोकू पहरों पहरों ,
गर महताब पे बस चल जाए तो |

इस जालिम दिल को रोक सकू ,
यु रातों में न मिलने आओ तो |

मुफलिस – निर्धन , शब् – रात ,
महताब – चाँद |

H.P.RAHI

Numaeesh ( Ghazal )

रेगजारो के दिल की गुलिस्ता क्या जाने ,
बहोत से ख्वाब नुमाइश पर लगा आया हूँ |

दिल ता जिगर तेरी रहगुज़र का मुंतजीर सा हुआ ,
गाफिल वहा हर साँस भूल आया हूँ |

हर रंग मेरा कैस का हर रंग लगे ,
अपनी सूरत के कई नकाब गिरा आया हूँ |

मेरा परवर भी गमगुसार हुआ ,
तेरे फरेब पर एक गर्द बिछा आया हूँ |

रेगज़ार – रेगिस्तान , मुंतजीर – इंतज़ार करने वाला ,
गाफिल – बेहोश , कैस – मजनू , गर्द – धुल |

H.P.RAHI

Woh Khat ( Ghazal )

सुबह को तेरा ख़त जो मिला था ,
सहरा में इक फूल खिला था |

तेरी आँखें याद आई थी ,
मयखाने को भूल गया था |

अँधेरा ही हकीकत थी मेरी ,
कोई दीप ले आया वोह तेरा ख़त था |

शाम को मैं फिर मयखाने में हूँ ,
जो मिला था, तेरा कोई पुराना ख़त था |

सहरा – रेगिस्तान

H.P.RAHI

tareef ( Ghazal )

तेरी आँखों ने यह जो कह दिया ,
बस इसको ही मैंने शायरी नाम रख दिया |

तालियाँ बजी थी , तारीफे थी मेरी ,
तेरा नाम जो मैंने महफिल में कह दिया |

जिस रात दिखा था तेरा चेहरा ,
उस रात को मैंने चौदहवी कह दिया |

तुम भी बन जाओगे मशहूर शायर ,
मेरी तरह जो तुमने उनको सुन लिया |

H.P.RAHI