himayat ( shayri )

फिर कभी चोरी नहीं करूँगा, वादा है ,
दर्द तेरा था और चुभ सा गया था मुझे ,
पर जब भी लिखने बैठता हूँ , तो वोह लम्हा ,
जिसकी किर्चिया आज भी मेरे जहन में मौजूद है ,
फिर उसी दीवानगी की हिमायत करता है |H.P.RAHI

Ab woh ek Ahsaas hi hai bas ( Nazm )

सुन मेरे खुदा , आज मुझ पर एक करम कर ही दे,
मुझे वक़्त से कुछ पल के लिए आजाद कर दे,
कही किसी मोड़ पर कोई छुट गया है,
उसे जरा फिर एक झलक देख आऊ,
हो सके तो थोडी सी सांस ले आऊ ,
जिदगी का भरोसा मेने खूब देखा है ,
आज नहीं गया तो न जाने फिर कब वक़्त मिलेगा मुझे ,
आदत नहीं है , तनहा सफ़र होता नहीं है मुझसे ,
वोह कोई रहगुज़र जो मेरे साथ हमेशा थी ,
बस उस पर से कुछ कदमो के निशान ही ले आऊ ,
मैं जाकर वोह खुशबू ही कैद कर ले आऊ,
जो महका देती थी मेरे हर जर्रे को ,
जो अनुभव बस बन कर रह गया है एक अहसास ही |

H.P.RAHI