uuns ( Shayri )
उन्स उठते है तो जिगर के छाले मेरे रो पड़ते है ,
के आग बुझाकर मैं उनपे राख मल देता हूँ ,
मेरी जिंदगी का रंग बहोत धूसर सा लगता है मुझे | H.P.RAHI
उन्स उठते है तो जिगर के छाले मेरे रो पड़ते है ,
के आग बुझाकर मैं उनपे राख मल देता हूँ ,
मेरी जिंदगी का रंग बहोत धूसर सा लगता है मुझे | H.P.RAHI
हमारे गुनाहों की दास्ताँ लिख रहा हूँ मैं ,
कभी जीत तो कभी हार लिख रहा हूँ मैं ,
मेरे गुनाहों को माफ़ करने वाले ,
मुझ पर कर न सके जो तुम , वोह करम लिख रहा हूँ मैं |
mst likha hai…
Bore me ja ke fir se inspiration mili lagta hai..