Ahmiyat

रास्ता था , जाने मुकाम , एक दहलीज थी शायद ,
उससे पार होके कई गुजर गए , कई लौट गए ,
वक़्त की कमी न थी तो तमाशा देखने लगे वही ,
पार जाने की हिम्मत जुटाते जुटाते रात हो गयी ,
तो वही सो गए मील के पत्थर का सहारा लेकर ,
सुबह उठे तो देखा न वोह देहलीज़ थी न मुकाम ,
रास्ते का भी नामो निशाँ तक न था ,
पर वोह मील का पत्थर वही का वही था ,
फासले के निचे कुछ लिखा था लाल रंग से ,
अहमियत रास्तो की है या मंजिल की ,
कुछ देर रुका , सोचा और फिर आगे बढ़ चला |

H.P.RAHI

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