badnaam kinaare ( Ghazal )

गुमनाम बहारो की गुमनाम मजारे है ,
बरबस ही मिले है जो , गुमनाम सहारे है |

छुपते हुए देखा है हमने कुछ अपनों को ,
महरबान अंधेरो में महरबान दरारे है |

इक आह सी उठती है , एक दर्द सा जाता है ,
बेईमान किरदारों के बेईमान नज़ारे है |

रोते हुए पाया है कश्ती के इरादों को ,
बदनाम समंदर के बदनाम किनारे है |

H.P.RAHI

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