himayat ( shayri )

फिर कभी चोरी नहीं करूँगा, वादा है ,
दर्द तेरा था और चुभ सा गया था मुझे ,
पर जब भी लिखने बैठता हूँ , तो वोह लम्हा ,
जिसकी किर्चिया आज भी मेरे जहन में मौजूद है ,
फिर उसी दीवानगी की हिमायत करता है |H.P.RAHI

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