do bhatke hue musafir

दो भटके हुए मुसाफिर ,
उस मंजिल की ओर , जिसका न कोई साहिल न कोई छोर ,
जाने क्या देखते , क्या सोचते , क्या गाते हुए बढे जाते है ,
दो भटके हुए मुसाफिर ,
साथ है फिर भी , एक डोर से बंधे ,
किसी रिश्ते की डोर तो नहीं लगती है लेकिन ,
किस धागे की डोर है ये फिर ?
शायद किसी कसम की ,
साथ चलने की कसम , उस अनजान मंजिल की ओर ,
जहा पर कुछ मिले भी तो शायद , साथ के सिवा कुछ न मिले ,
दो भटके हुए मुसाफिर ,
हवाओ पे पाँव रखते , बादलो के पार चले ,
आसमान के आगे , चाँद के पार चले ,
उन्हें वोह आग का दरिया चाँद के पार ही मिल जाये शायद ,
वोह आग का दरिया ही इनकी मंजिल हो |
कोई कहता है , इश्क एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ,
पर हमें तो इश्क के सिवा कही नहीं जाना है ,
बस इसी दरिया में ही डूब जाना है |
दो भटके हुए मुसाफिर ,
उस मंजिल की ओर , जिसका न कोई साहिल न कोई छोर |

H.P.RAHI

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