do chand hi bo diye to kya ( Ghazal )

एक ‘राही’ भुला भटका सा , दो चार कदम पर मंजिल क्या ,
यह बहोत आम सी जिंदगी , एक उम्र जिए तो जिए ही क्या |

हर शाम थकी इन राहो को मैं घर की राह दिखाता हूँ ,
कुछ करने की यह जिद ही सही , दो ख्वाब ही देख लिए तो क्या |

खुद अपनी जमीं पे अपना आसमान उगायेंगे ,
चाहे सितारे साथ नहीं , दो चाँद ही बो दिए तो क्या |

अपने लिए सब एक बराबर जश्न का मौका होता है ,
वो रात का सन्नाटा कैसा , और दिन का पागलपन ही क्या |

H.P.RAHI

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