ehsaan ( Ghazal )

शाम मुझपे एहसान करती है ,
रोज़ मिलती है जुदा होती है |

यु सताती है मुझे हर साँस मेरी ,
नाम लेती है और बदनाम होती है |

क्या वफ़ा , क्या उम्मीद और क्या ज़ज्बात ,
इससे बेहतर भी कोई सजा होती है ?

यु दिखती नहीं उजालो में नजारों की तरह ,
यह शमा , दिल के आइनों में अक्स होती है |

H.P.RAHI

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