ek katil ( Ghazal )

उठा धुआ तक नहीं जब दिल ये मेरा खाक हुआ ,
तेरी शान में गुस्ताख थी चिंगारी , जो सजा ए बेनूर हुयी |

कातिल का पता जानते हो तो पूछते क्यों हो ,
ए दर्दे जिगर मेरे, सो जाओ के बहोत देर हुयी |

शबे फुरकत में रिंद , बहोत पीना नहीं अच्छा ,
कट जाएगी यह रात , जो बेहोश न भी हुयी |

आईने तोड़ के बैठा हूँ एक पत्थर पे रक्खे सर ,
परछाई से जगडी के हाय , नज़र धुंधली हुयी |

शबे फुरकत – जुदाई की रात , रिंद – शराबी |

H.P.RAHI

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