ek khwab hi to hai

एक ख्वाब ही तो है ,
रात कट जाती है मेरी , तेरा क्या जाता है ?
क्यों हर बार आकर शीशे तोड़ जाता है ?

जब होता हूँ उस मोड़ पर ,
जहा से रेल की पटरी गुज़रती है ,
जिस पर कभी एक ट्रेन गुजरी थी ,
किसी मुसाफिर की आमद का वक़्त भी हुआ था ,
हर बार सोचता हूँ , हवा के पंख पकड़ कर ,
चंद मील मैं भी सफ़र कर लू ,
मैं हाथ बढ़ाता हूँ तो तेरा क्या जाता है ?
क्यों हर बार आकर शीशे तोड़ जाता है ?

रात को जब उजाले जागते है ,
तब एक दूर जाते खुशबु से साए का ,
देर तक का पीछा करते करते ,
कुछ दहलिज़े ज़माने के पार जाता हूँ ,
कभी कभी चाँद के उस ओर भी जाता हूँ ,
तेरे बदन तक वक़्त भर में पहोच पाता हूँ ,
तेरी बाहों तक आता हूँ तो तेरा क्या जाता है ?
क्यों हर बार आकर शीशे तोड़ जाता है ?

कभी कही नहीं जा पाता , कभी दूर तक निकल जाता हूँ ,
एक ख्वाब ही तो है , तेरा क्या जाता है ?

H.P.RAHI

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