gubaar (गुबार)

जब बारिश में भीगते हुए भी जिया जलता है ,
और रिम जिम जब धुआ भी उठने नहीं देती ,
तब कुछ असीर अरमानो की बेडिया टूटने लगती है ,
और याद आता है वोह ख्वाब ,
जिसे बुनते मुझे पुरे दो साल लगे थे ,
और टूटने में वोह कुछ पल ,
ओ साथी रे , दिन डूबता है , रात होती है ,
तू होती नहीं , फिर भी होती है ,
तेरा जाना होता ही नहीं कभी |

इस “राही” का है सफ़र तनहा ,
और सिफर इसकी मंजिल ,
यु मंजिल का भरम मत बन ,
बारिश में जिया जलने की सजा तो न दे |

असीर – कैद , सिफर – शुन्य |

H.P.RAHI

2 thoughts on “gubaar (गुबार)”

  1. kaafi kareebi baat keh gaye dost ismein… mere toh dil ko chuu gayi ye nazm…:D ek aansoo nikal kar beh gaya kahi:D

  2. devanshu,
    aansu hi tha kya wo, dhyan se dekh…. aankh se hi nikla tha ki kahin aur ka pani nikal gaya ye nazm samajhte samajhte.

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