harf ( Ghazal )

सहर तक आते आते हर पल को गिनता रहा ,
मेरे दिल अजीज एक ख्वाब ने सताया बहोत मुझे |

कभी कभी अपने भी जरा कुछ काम आ जाते है ,
मेरी ग़ज़ल से टूटकर एक हर्फ़ ने सिखाया बहोत मुझे |

एक हवा रोज आखो में आ जाती है कुछ तिनके लेकर ,
मेरे वतन ने हर तरह से पुकारा बहोत मुझे |

दौड़ता रहा पीछे पीछे बहोत दूर तक रेत पर ,
कुछ कदमो के निशानों ने थकाया बहोत मुझे |

सहर – सुबह , हर्फ़ – अक्षर |

H.P.RAHI

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