hizr ( Shayri )

वोह जुबा पर क्यों ऐसे आता है ,
दिल जलाता है चला जाता है ,
उस दिलरुबा को जाने क्या कहिये ,
जो ख्वाब को भी हिज्र बना जाता है | H.P.RAHI

हिज्र – जुदाई |

3 thoughts on “hizr ( Shayri )”

  1. @Jaspal Bhai maine waha par niche hi iska matlab bhi likha hai. main hamesha jo bhi urdu words hote hai unka hindi translation niche likhta hoo.
    हिज्र – जुदाई | 🙂

  2. दिल में हो जो वो ऐसे ही याद आता हैं,
    ह़र उस पुरानी यादो को तजा कर जाता हैं,
    कैसे कहते हो कि उसे भुला दिया तुमने ?
    आज भी ख्वाबो में फिर वो क्यों आता हैं !

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