kaisa lagta hai

तुम आग में जले हो कभी , तुम बार बार मरे हो कभी ?
तुम जब कही नहीं थे तब कहा पर थे ?
कौन राह चले थे जब रुके रुके से थे ?
ख़ामोशी को सुन कर देखा है, कैसा लगता है ?
यह अँधा कुआ झाका है कभी , कैसा लगता है ?

सन्नाटो के शहर में आकर , धुन कोई छेड़ी है कभी ?
पत्थरो के जंगलो में नदी बनकर बहे हो कभी ?
आसान से जो नज़र आते है , इरादे जिए है कभी ?
कभी सूरज को पीकर देखा है , कैसा लगता है ?
कभी चाँद चुरा के देखा है , कैसा लगता है ?

जब जंग छिड़ी थी बागीचे में , तुमने भी कुछ फूल तोड़े थे ,
कुछ सफिने तुमने भी डुबोये थे , कुछ राहे तुमने भी तनहा छोड़ी थी ,
क्या सोचा है कभी , उस पार क्या बिता है वक़्त अब भी ?
रूठे हुए कुछ साये , सूखे हुए पत्तो जैसे कुछ साये ,
जिन्दा साये , मुर्दा साये , उस पार क्या बिता है वक़्त अब भी ?
कभी मुड़कर पीछे देखा है , कैसा लगता है ?
कोई छोटा सा वादा भी जीकर देखा है , कैसा लगता है ?

H.P.RAHI

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