maji

नाज़ुक मोड़ था , उसने तो बस अपना साया छुड़ा लिया ,
और मेरे हिस्से का सूरज देखता रहा , शीशे में ताकता रहा |
अब भी सुबह की धुंध में कुछ शेरो के माजी उभरते है ,
और रात वाली नज़्म जब दिनों तक साथ चलती है ,
आखों की कोरे जलती रहती है , नींदे सिर्फ सफाई देती है ,
तेरे साये का पीछा करते करते मेरे हिस्से का सूरज ,
हाफ्ने लगता है , तब बदन की तपिश से मैं चौक उठता हूँ ,
और सोचता हूँ , वक़्त की चारागरी भी क्यों काम नहीं आई ?
तुने तो बस अपना साया ही छुड़ाया था , नाज़ुक मोड़ था ,
एक कस्तूरी अभी भी मेरे पास है , जिसमे तू कैद है ,
शायद यह अंधी दौड़ है , और मुझे दौड़ते जाना है ,
मेरे हिस्से के सूरज की छाव तले |

H.P.RAHI

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