manhusiyat ( Shayri )

वोह रहगुज़र मेरी रहगुज़र रहे ,
साथ चलने से कुछ इत्तेफाक हो जाते है |
अपनी मनहूसियत की चर्चा करता फिरता हूँ ,
साथ चलने वाले कुछ करम कर जाते है |H.P.RAHI

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