mera jakhm kuch aur khul gaya ( Ghazal )

मेरी तन्हाइयो का साथी मुझको मिल गया ,
तिशनगी थी इतनी कि सारा मयकदा मैं पि गया |

मेरी पहचान का कोई काफिला गुजरा था मेरे दर से ,
शहनायिओ कि आवाज थी कि मैं सारी रात जी गया |

था नहीं यकीन कि इस तरह से गुजरोगी तुम मेरे सामने से ,
उस यकीन कि मौत थी कि जशने ग़म का आलम वोह दे गया |

वोह शब् कटी के मैं कटा कुछ भी नहीं खबर ,
था चुप्पियों का शोर के मेरा जख्म कुछ और खुल गया |

तिशनगी – प्यास , शब् – रात |

H.P.RAHI

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