phir nayi phursate ( Ghazal )

एक ख्वाब की बख्शीश को संभाले , फिर नयी फुरसते …

घूमते रहें एक रात ओढ़े हुए चुपके से ,
यादो की गलियों से कुछ कदमो के निशान चुराए |
फिर नयी फुरसते…

चाँद बांधे मुट्ठी में तारो से जगडा किये ,
कुछ टुकड़े चांदनी के धुप में सुखाये |
फिर नयी फुरसते…

फिर उन्ही पानियों में हम नमक थामे रहे ,
लम्हों के वादे, सदियों में निभाए |
फिर नयी फुरसते…

H.P.RAHI

7 thoughts on “phir nayi phursate ( Ghazal )”

  1. yeh shayad shabdo ka janjhal , ya phir koi damkati roshni hain,
    yeh tajgi bhari tumhari ghajal hain , ya phir ! phir nayi phuraste hain

    good job

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