raat ki ek baje

क्यों ग़मज़दा है हर बात आज रात की ,
क्या अब भी बरक़रार है वोह शाम की बारिश ,
जो तिनको की तरह आखो में चुभी जा रही थी |
न जाने क्यों , वो शाम ढल गयी , आधी रात भी हो गयी ,
क्यों ढूंढता रहता हूँ तुझे चेट लिस्ट में रात की एक बजे ,
तू तो कबकी जा चुकी ,
आशा करता हूँ तेरा तकिया ,
मेरी पिछली नज़्म वाला चाँद होगा |
पलटना तेरा जरूरी क्यों था ,
क्यों मेरा ऐसा सोचना जरूरी है ,
कई सवाल है , कोई जवाब भी होगा ,
आखो के आईने पे नोट कर लिए है ,
तुझसे पूछुंगा , जब मिलूँगा ,
पढ़ लेना , अगर आँखे मिल जाये तो |

H.P.RAHI

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