shaam ( Ghazal )

शाम , पलकों में डूबी एक किताब सी लगती है ,
पत्तो पे जिसके ढलकी , शायद कुछ शराब सी लगती है |

शाम , घायल अश्को से भी घायल लगती है ,
गहराई से देखा तो यह एक हिसाब सी लगती है |

शाम , पागल दिल सी पागल , किसी बोजिल शबाब सी लगती है ,
बुझते हुए चिराग से भड़की जलती छाव सी लगती है |

H.P.RAHI

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