sham bhujaye hue ( Ghazal )

अरसा बिता है किसी की याद सताए हुए ,
अब भी रखता काश मैं तूफान जगाये हुए |

उसकी सोहबत में नज़ारे हसीन लगते थे ,
उसके पहलु में मुझे चाँद सितारे करीब लगते थे
अब तो जैसे सन्नाटो के शोर गूंजते रहते है
मुझको भी तो युग बीते आवाज़ लगाये हुए

अजीब दौर था , मुहोब्बत की बात करते थे,
आग के दरिया में किनारों की बात करते थे,
न जाने तिश्नगी कैसे बुझा लेती है खुद ही प्यास
जलता रहता हूँ हर रोज़ एक शाम बुझाये हुए |

तिश्नगी – प्यास |

H.P.RAHI

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