Voyager 1

रोशनी का एक बिंदु मात्र है
“वॉयेजर एक” ने फ़ोटो खींच के बताया था
सौर मंडल के आखरी छोर से
“धरती” मुझे तो बहोत बड़ी लगती थी
बिल्कुल वैसे ही जैसे हमने अहंकार पाला है

हिटलर, अमीन, नीरो, माओ, चंगेज़,
ईसा, बुद्धा, कृष्णा, नानक, पैगम्बर
अपोकलिप्स, एक्सओडस, होलोकॉस्ट
बहार, वादी, कविता, संगीत
पावर, पॉलिटिक्स, पॉल्युशन, करप्शन
राइट, लेफ्ट, धर्म, कर्म
जोबन, बचपन, सुहाग शैय्या, मृत्यु शैय्या
रिश्ते, दोस्त, जज्बात, मुहब्बत, 
मुफ़लिस, समृद्ध, गृहस्थी, फकीरी
निराशा, उम्मीद, महत्वाकांक्षा
तुम, मैं, तेरा, मेरा
सिर्फ मैं, सिर्फ मेरा

सब बेमानी लगने लगा
बड़े अचरज से निहारा वो फ़ोटो जब मैंने

बड़े अचरज से निहारा वो फ़ोटो जब मैंने
टकटकी लगाए
एक विचार कौंधा मुझे
धरती सिर्फ अहंकार तो नही
ये बेमतलब बेमानी नही
ये रोशनी का एक बिंदु मात्र सही
ये ही रोशनी है
और मैँ ही ब्रह्मा हूं
“मैं” नही

H.P.RAHI

davanal

जहा सिर्फ नफ़रत की फसल कटती है
और दावानल की चिंगारी सिचि जाती है
वो जमींन कौनसी है ?

जहा ढलती है तलवारे उस पवित्र धातु से
जिसमे संभावना थी हल और हंसिया बनने की
वो ईमारत कौनसी है ?

दम्भ और रूढ़ि परम्पराओ, विचारो के शोर में
जहा दिल टूटने की तो आवाज़ तक सुनाई नहीं देती
वो समाज कौनसा है ?

ग़ुरबत जहा सिर्फ एक प्रयोगशाला है
धर्म, धर्म नहीं, जैसे कोई अफीम है
वो चमन कौनसा है ?

उस चमन से मेरा कोई नाता नहीं
उस समाज का मैं बाशिंदा नहीं
उस इमारत की पनाह मुझे मंजूर नहीं
उस जमींन से मेरी जड़े मैंने अब उखाड़ ली

अब असमंजस में हु
कहा जाऊ ?

H.P.RAHI

bulldozer

साथ और विकास की ये अजब रस्म निभाते हो
आधे-कच्चे अरमानो पे ये पक्के बुलडोज़र चलाते हो

थोड़ा ही वक़्त गुजरा था की थोड़ा होश ही आता
बुझने को थी नफरते कि फिर वही हवा चलाते हो

सदियों से समझ पे पड़ी धूल थोड़ी हटाते तो
धर्म कर्म के ये कैसे मतलब समझाते हो

तुम्हारी नियत का पता तो था पर दिल मानता नहीं था
हर बात फरेब थी, तुम क़यामत के जाल बिछाते हो|

H.P.RAHI

migration

ये जो मेरे पांव के छाले है,
ये दरअसल कुछ और है,
ये तुम्हारी सफेद वर्दी पे सजे हुए सितारे हैं।

जब मैं इन शानदार सड़कों पे गुजरता,
मील  के पत्थरो को ताकता हूं,
कदम दर कदम अपने घर से खुद को थोड़ा और दूर पाता हू,
तुमने गति सीमा के खूब नए कीर्तिमान गढ़े है।

बहोत कम ही बोझ ले के निकला था,
बस कुछ एक जिस्म है मेरे साथ,
और थोड़ा बहुत भूख का सामान,
ये जो तुम्हारी राहतो की नुमाइशे है ना,
मैं इनसे इत्तेफाक रखता हू,
पर अभी सोचने का समय थोड़ा कम है,
अगर, पहोच गया, तो परखुंगा।

H.P.RAHI

aag

जलाओ तुम भी कुछ इबारतें
हम भी कुछ पन्ने जला ही देते है इस बेतुकी किताब के
जिसे लिख के गए थे कुछ मतवाले लोग
देश चलाने का ताना बुना था
जुर्रत की थी हमें समझाने की के कौन राह चलनी है
आओ बता दे खुल के
हमें मंज़ूर नहीं ये जो तुम्हारी जुर्रत थी
नफरतों के बीज
कोई आज ही तो किसी ने बोए नहीं है
इस कृषि प्रधान देश को
ये फसल तो अभी कई सदियों तक काटनी है
तुम क्या फंदे से झूल जाते हो सिर्फ भूख से मजबूर होकर
तुम हमसे सीखो के नफरत की आग से पेट कैसे भरता है
नींद भी गजब की आती है

H.P.RAHI

khamkhwa ( Ghazal )

जब कभी ऐतबार होता है
इश्क़ का इम्तेहां होता है

सिलसिलो की सुनु या दिल की सुनु
रोज़ ही इंतेज़ार होता है

किर्चियां उड़ के चुभ न जाये कही
आईने है, अश्क कौन कहता है

ख़ामख्वा लिख रहे हो, राही
राज़ क्यों कर बयान होता है H.P.RAHI

Ehtaram

मुझे अल्लाह कहो या राम कहो
तुम्हारा मतलब निकले
तो मुझे इत्मीनान हो

तुम्हारे सारे गुनाह माफ़ करता हूँ
मेरा नाम उछालो इस तरह
की मेरा एहतराम हो

H.P.RAHI

एहतराम – सम्मान

badastoor

जब पिघलता हुआ रोशन सितारा
अपनी आखरी चाल चलता है , खूनी बाज़ी लगाता है
और हार जाता है आसमानी समंदर से हर बार
डूब जाता है

जब शाम ढले साये घर लौटते वक़्त
धुंधले धुंधले निशान आवाज़ों के छोड़ जाते है
रात वो सारे बटोर लेती है
ईंधन जमा करती है

जब रातो के सन्नाटो में
दो जिस्म उबलते है , पिघलते है
एक नयी कहानी बुनते है
सुबह तलक उफ़क पे उकेरते है

हर रोज़ एक नयी परवाज़ लिए
नन्हे परिंदे अपनी शाखों से दूर
क्षितिज की आग़ोश में जाते है
उम्मीद एक और नए दिन की लिए

सहराओ में रेत के दरिया है
जो ठहरे हुए भी बहते से लगते है
जाने किसकी आमद के इंतज़ार में वहा
समय पड़ा हुआ दोपहर काटता है

जब उजाले चीखते है
टुकड़ा टुकड़ा होकर ज़मीन बिखर जाती है
एक कतरा अब्र की तलाश में
निगाहें शाम तलक सिर्फ धोखा खाती है

क्रम जारी है बदस्तूर यही सदियों से
सदियों का ये खेल बहोत निराला है |

H.P.RAHI

ek khayal

एक ख्याल ,
रोज आता है , दरवाजे खडखडाता है , पीछे देख के मुस्कुराता है , चला जाता है |
मैं बस एक हाथ उठा पाता हूँ ,
वोह उससे मिलने की तकलीफ भी उठाने नहीं देता ,
कहता है , लोगो के बीच हो , खुशनसीब हो ,
अभी रहो यही , मैं मिलूँगा तुम्हे पर अभी नहीं |

H.P.RAHI

aag ho jaye ( Ghazal )

ज़माने से कुछ तो सवाब हो जाये
दीवाने का इश्क़ में मुकाम हो जाये

कई रोज़ हो गए है तमाशा गुज़रे
चर्चा-ए-सरे-आम का इन्तेज़ाम हो जाये

शर्त ये थी के ख़त्म न होंगे
ज़ुल्म तेरे सभी शराब हो जाये

तुझको इतनी तो खबर रही होगी
ये पयामो की आरज़ू थी, आग हो जाये । H.P.RAHI

dil dil se ja mila ( Ghazal )

दिल दिल से जा मिला
जख्मो की फिकर है क्या

ना ज़माने की बात कर
तर्क-ए-दिल सुनेगा क्या

बेतकल्लुफ़ जो है आपसे
नज़रो की खता है क्या

हो गयी हर अदा बेहुनर
चिलमन को उठाया है क्या

एक वफ़ा एक अहद के सिवा
कुछ गरज़ दिल करे और क्या | H.P.RAHI

raaj ( Ghazal )

आप हमसे यु खफा होते है
महफ़िलो में भी कही राज़ बयां होते है

मेरी नज़्मों में उन आँखो का ज़िक्र रहता है
मयकदो के यु सभी क़र्ज़ अदा होते है

तेरी जानिब कुछ फासले सा बढ़ता हूँ
सूखे हुए फूल जब किताबो से रिहा होते है | H.P.RAHI

yaad aaya na karo ( Ghazal )

तुम इतना मुझे याद आया न करो
दिल बड़ा कमजोर है, इस तरह बुलाया न करो

साँसों का सफ़र बाकि है ज़रा सा ही और
उन पुराने वास्तो की धूल यु उडाया न करो

क़र्ज़ रातो के अभी बाकि है बहोत सारे
आकर यु ख्वाबो में तुम मुझको जगाया न करो

मेरी गजलो के हर्फ़ है सब हाँफते हुए,
ये बाते तुम युही हँसी में उड़ाया न करो | H.P.RAHI

tumne kab se sikh liya ( Ghazal )

तुम तो मेरे थे हमेशा , क्या गज़ब तुमने किया
लोगो की बातों में आना , तुमने कब से सिख लिया

एक करम की थी गुज़ारिश , एक रहम की थी उम्मीद
आ के तेरे शहर में , क्या गलत हमने किया

कितने मयखाने जले और कितनी सदियों के जगे
क्या रखे इनका हिसाब , जो दिया तुमने दिया

शाम के पतजड़ बीने थे मौसमो की याद में
रात की बारिश ने सब तिनको को फिर तूफां किया ।

H.P.RAHI

karz ( Ghazal )

मौसमें गुल है अभी इसको गुज़र तो जाने दो
ऐ बहारो मुझको मेरे माज़ी से मिल जाने दो

आसमानो से परिंदे अलविदा कहते किसे है
जंगलो के राज है सब राज ही रह जाने दो

तेरे शहर के बाशिंदे कुछ मेरे गाँव में ठहरें हुए है
सितारो बादलो से निकलो ज़रा कुछ रोशनी हो जाने दो

सहराओं के कर्ज़ कितने थमती थमती साँसो पे है
जागती आखों के सागर कुछ छलक तो जाने दो ।

H.P.RAHI

dil karta hai ( Nazm )

लहू दिल से खरोंच लू
दिल करता है
क़त्ल हो जाना मुश्किल है
कौन कहता है ?
टूट के बिखर जाये कभी
उस दहलीज़ पे जाकर
रश्क हो जाये उन्हें मुझपे
मन होता है |
बेशुमारी शामिल थी
हर चीज़ में अपनी
बेहयाई भी होती कुछ
कितना सहता है ?

H.P.RAHI

jalte hue khat ( Ghazal )

दिलजले दिल यु खुदाओं की खुदाई रोए
जलते हुए खत ज्यो असीरी की रिहाई रोए

दर्द-ए-चारागिरी तो वस्ल-ए-मयख़ाने में थी
और हम बस एक मुलाक़ात की दुहाई रोए

तजरूबा खूब रहा उल्फत-ए-मुसीबत का
लोग क्यों खाम्ख्वा यार-ए-जुदाई रोये

जाने कितने हिसाब होने को थे लेकिन
जिंदगी बस वक़्त को ही गवाही रोये |

असीरी – कैद , चारागिरी – इलाज़ , वस्ल – मिलन

H.P.RAHI