do bhatke hue musafir

दो भटके हुए मुसाफिर ,
उस मंजिल की ओर , जिसका न कोई साहिल न कोई छोर ,
जाने क्या देखते , क्या सोचते , क्या गाते हुए बढे जाते है ,
दो भटके हुए मुसाफिर ,
साथ है फिर भी , एक डोर से बंधे ,
किसी रिश्ते की डोर तो नहीं लगती है लेकिन ,
किस धागे की डोर है ये फिर ?
शायद किसी कसम की ,
साथ चलने की कसम , उस अनजान मंजिल की ओर ,
जहा पर कुछ मिले भी तो शायद , साथ के सिवा कुछ न मिले ,
दो भटके हुए मुसाफिर ,
हवाओ पे पाँव रखते , बादलो के पार चले ,
आसमान के आगे , चाँद के पार चले ,
उन्हें वोह आग का दरिया चाँद के पार ही मिल जाये शायद ,
वोह आग का दरिया ही इनकी मंजिल हो |
कोई कहता है , इश्क एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ,
पर हमें तो इश्क के सिवा कही नहीं जाना है ,
बस इसी दरिया में ही डूब जाना है |
दो भटके हुए मुसाफिर ,
उस मंजिल की ओर , जिसका न कोई साहिल न कोई छोर |

H.P.RAHI

tera muslman hona

आज कुछ पुराने ख़त टटोल रहा था ,
जिंदगी की ताजगी से भरी उन यादो को ,
फिर से जीने चला था |
कितने रंग बिखरे हुए थे उन सफ़ेद कागजो पर , जिंदगी कितनी रंगीन थी ,
कभी तेरी शिकायत ने मुझसे नज़र भर ली ,
कभी रुलाई तेरी मेरे लबो पे इनाम बन गयी ,
और कभी तेरे खून के धब्बे देख मेरी सासे तेज़ हो गयी ,
कितनी शिद्दत थी जो भी करते थे , मौसिकी हो जैसे सास लेना भी ,
लबरेज़ ख्वाबो से चश्म , दिखाई भी वही देता था जो चाहते थे ,
ज़माने भर का ज़ज्बा अपनी जेब में लेकर महोब्बत करते थे |
कुछ चुभा शायद , एक चूड़ी का टुकड़ा छुपा बैठा था उस कागज़ के पीछे ,
एक दाग तेरे खूं के आगे मेरा भी लग गया , लाल से लाल मिल गया ,
और एक ज़ख्म फिर से हरा हो गया |
मेरे गुनाह का भागिदार यह समाज था भी, नहीं भी ,
वोह बात अनसुनी कर देता तो क्या बिगड़ जाता ,वैसे भी अब कहा कुछ सुनाई देता है ,
धड़कन से लेकर ज़मीर तक की आवाज़ दब के रह जाती है मेरे दंभ के शोर में ,
इस समाज के ठेकेदारों में अब मैं भी तो गिना जाता हूँ |
तुझसे वोह आखरी मुलाकात अब भी धुंधली नहीं हुयी मेरे जहन में ,
मेरी हमनफस मुझे माफ़ करना , तेरे कद से मेरी लम्बाई छोटी पड़ गयी थी ,
सारा साहस बस उस शाम दरिया में बह गया था ,
तेरा मुसलमाँ होना मेरी महोब्बत पर भारी पड़ गया था |

H.P.RAHI

himayat ( shayri )

फिर कभी चोरी नहीं करूँगा, वादा है ,
दर्द तेरा था और चुभ सा गया था मुझे ,
पर जब भी लिखने बैठता हूँ , तो वोह लम्हा ,
जिसकी किर्चिया आज भी मेरे जहन में मौजूद है ,
फिर उसी दीवानगी की हिमायत करता है |H.P.RAHI

Ab woh ek Ahsaas hi hai bas ( Nazm )

सुन मेरे खुदा , आज मुझ पर एक करम कर ही दे,
मुझे वक़्त से कुछ पल के लिए आजाद कर दे,
कही किसी मोड़ पर कोई छुट गया है,
उसे जरा फिर एक झलक देख आऊ,
हो सके तो थोडी सी सांस ले आऊ ,
जिदगी का भरोसा मेने खूब देखा है ,
आज नहीं गया तो न जाने फिर कब वक़्त मिलेगा मुझे ,
आदत नहीं है , तनहा सफ़र होता नहीं है मुझसे ,
वोह कोई रहगुज़र जो मेरे साथ हमेशा थी ,
बस उस पर से कुछ कदमो के निशान ही ले आऊ ,
मैं जाकर वोह खुशबू ही कैद कर ले आऊ,
जो महका देती थी मेरे हर जर्रे को ,
जो अनुभव बस बन कर रह गया है एक अहसास ही |

H.P.RAHI