tera muslman hona

आज कुछ पुराने ख़त टटोल रहा था ,
जिंदगी की ताजगी से भरी उन यादो को ,
फिर से जीने चला था |
कितने रंग बिखरे हुए थे उन सफ़ेद कागजो पर , जिंदगी कितनी रंगीन थी ,
कभी तेरी शिकायत ने मुझसे नज़र भर ली ,
कभी रुलाई तेरी मेरे लबो पे इनाम बन गयी ,
और कभी तेरे खून के धब्बे देख मेरी सासे तेज़ हो गयी ,
कितनी शिद्दत थी जो भी करते थे , मौसिकी हो जैसे सास लेना भी ,
लबरेज़ ख्वाबो से चश्म , दिखाई भी वही देता था जो चाहते थे ,
ज़माने भर का ज़ज्बा अपनी जेब में लेकर महोब्बत करते थे |
कुछ चुभा शायद , एक चूड़ी का टुकड़ा छुपा बैठा था उस कागज़ के पीछे ,
एक दाग तेरे खूं के आगे मेरा भी लग गया , लाल से लाल मिल गया ,
और एक ज़ख्म फिर से हरा हो गया |
मेरे गुनाह का भागिदार यह समाज था भी, नहीं भी ,
वोह बात अनसुनी कर देता तो क्या बिगड़ जाता ,वैसे भी अब कहा कुछ सुनाई देता है ,
धड़कन से लेकर ज़मीर तक की आवाज़ दब के रह जाती है मेरे दंभ के शोर में ,
इस समाज के ठेकेदारों में अब मैं भी तो गिना जाता हूँ |
तुझसे वोह आखरी मुलाकात अब भी धुंधली नहीं हुयी मेरे जहन में ,
मेरी हमनफस मुझे माफ़ करना , तेरे कद से मेरी लम्बाई छोटी पड़ गयी थी ,
सारा साहस बस उस शाम दरिया में बह गया था ,
तेरा मुसलमाँ होना मेरी महोब्बत पर भारी पड़ गया था |

H.P.RAHI

2 thoughts on “tera muslman hona”

  1. Wow..last line just gave me goosebumps…i particularly like the ending… ending was brilliant…many aitmes poem starts well but loose the steam when coming to end… but this is different, I am not a literature critic, don’t know in whihc genre should it be put, but if there is ever a lover who fell in love with person from other religion will just got blown away by this..
    keep rocking RAHI:)

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