teri baahein ( Ghazal )

तेरी बाहे सुनी राहें छोड़ कर जा चुकी होंगी ,
कही तो आग लगी होगी , कही बरसात हुई होगी |

रहा करते थे जिनकी धडकनों में हम ,
तडपता छोड़ कर जाना उनकी आदते होंगी |

उन्हें हम ग़म के मारो का मसीहा कहते फिरते थे ,
के मसीहा बन के तरसाना उनकी ख्वाहिशे होंगी |

लरबते होठो के प्याले छुआ करते थे होठो से ,
मगर दिल ही न छु पाए , यह अपनी किस्मते होंगी |

कि सागर के छलकने से यह साहिल टूट जाते है ,
कि कश्ती का बिखर जाना उनकी रहमते होंगी |

H.P.RAHI

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