thaka thaka ek rahi hoo main ( Ghazal )

एक सपना देखा , कितना वोह अच्छा सपना था |
कुछ अपना भी देखा था , कितना वोह सच्चा अपना था |

ख़त कितना सुहाना था , कागज कुछ पुराना था ,
कुछ धुंधला सा कुछ उभरा सा , वोह तेरा इकरारनामा था |
बहता बहता एक आसू आया , पोछ गया कुछ स्याह को ,
कितना बेरहम यह आसू था , ले गया तेरे दिल को ,
एक यह दिल ही तो मेरा अपना था , भले कागज़ पे ही था जो ,
और तो सब कुछ धुआ धुआ सा सांस दे गया तेरे तन को |

बरबस कही एक पत्ता पाया ,
पत्ते पे कुछ अपना पाया |
मिलो उडी हवा की छाया ,
छाया में भी खुद को पाया |
राख राख एक अंगारा था ,
उडी हवा तो वोह भी छाया था |
एक बादल मस्त बदन का पाया ,
वोह भी बरसो से ना बरसा था |

इन अपनों का मिश्रण हूँ मैं ,
इन सपनो का जीवन हूँ मैं ,
वीरान मंजिल के ढांचे पर बैठा ,
थका थका एक राही हूँ मैं |

H.P.RAHI

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