yaado ke gulmohar

माजी जाने कहा कहा से ले आता है ,
यादो के गुलमोहरो से लम्हों की शाखे तोड़कर ,
आदत में है आजकल इसके ,
हाथो में इसके कही से एक कुल्हाड़ी आ गयी है ,
गुलाबी,
एक किताबी संदूक में छिपाकर रखी थी ,
मैं बस टहनीया सुखाकर जला देता हूँ ,
रात पश्मीने की तनहा बसर नहीं होती |

H.P.RAHI

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